Archive for November, 2010

senior citizen सीनियर सिटी जन


सीनियर सिटी जन

साठ साल की उम्र के होने पर

रिटायर मेंट के बाद की पेंशन हू

या रेलवे में मिलने वाला कन्सेशन हू

या फिर पेंसठ साल के बाद का

इनकम टैक्स एक्सेम्प्शन हू

कितनी ही विसंगतियों से भरा

एक साधारण जन हू

जी हाँ में एक सीनियर सिटिजन हू

जब में परिपक्व और

अनुभवों से भरपूरहोता हू

रिटायर कर दिया जाता हू

क्योकि नयी पीड़ी के लिए

मै ही जगह बनाता हू

सिर्फ राजनीती में ही मेरी कद्र होती हे

क्योकि नेता के रिटायर मेंट की कोई उम्र नहीं होती हे

जो पेरो से खुद नहीं चल पाता हे

वो पूरे देश को चलता हे

और आने वाली पुश्तो का भी

इंतजाम कर जाता हे

जिसका ब्याज कई गुना बढ गया हे

एसा मूलधन हू

जी हां में एक सीनियर सिटिजन हू

मेरे लिए बस में,ट्रेन में

और घर के एक कोने में

एक सीट रिजर्व होती हे

एक सीट ऊपर भी रिजेर्व होती हे

स्वर्ग हो या नरक

कही भी जाऊ, क्या पड़ेगा फर्क

क्योकि इन दोनों लोको का अनुभव

मेने इसी जीवन में ले लिया हे

कभी हंसी ख़ुशी, कभी घुट घुट के

जीवन जिया हे

थका हुआ तन हू

टूटा हुआ मन हू

जी हां में एक सीनियर सिटिजन हू

प्रकृति के नियम भी अजीब हे

वृक्षो से जब पुराने पत्ते गिर जाते हे

तब नए पत्ते आते हे

पर इंसानों में

पुराने पत्ते पहले नए पत्तो को उगाते हे

और नए पत्ते थोड़े बड़े होने पर

पुराने पत्तो को गिराते हे

में भी एसा ही पका हुआ पुराना पत्ता हू

जो कभी भी गिराया जा सकता हू

मेरी वानप्रस्थ की उम्र हे

इसलिए रोज बगीचे में घूमने जाता हू

चिंता और जिम्मेदारियों से मुक्त

सन्यासी सा जीवन बिताता हू

लाफिंग क्लब में हँसता हू

और साँस लेने के लिए करता प्राणायाम योगासन हू

जी हां में एक सीनियर सिटिजन हूa

सीनियर सिटी जन


सीनियर सिटी जन
साठ साल की उम्र के होने पर
रिटायर मेंट के बाद की पेंशन हू
या रेलवे में मिलने वाला कन्सेशन हू
या फिर पेंसठ साल के बाद का
इनकम टैक्स एक्सेम्प्शन हू
कितनी ही विसंगतियों से भरा
एक साधारण जन हू
जी हाँ में एक सीनियर सिटिजन हू
जब में परिपक्व और
अनुभवों से bharpoor होता हू
रिटायर कर दिया जाता हू
क्योकि नयी पीड़ी के लिए
मै ही जगह बनाता हू
सिर्फ राजनीती में ही मेरी कद्र होती हे
क्योकि नेता के रिटायर मेंट की कोई उम्र नहीं होती हे
जो पेरो से खुद नहीं चल पाता हे
वो पूरे देश को चलता हे
और आने वाली पुश्तो का भी
इंतजाम कर जाता हे
जिसका ब्याज कई गुना बढ गया हे
एसा मूलधन हू
जी हां में एक सीनियर सिटिजन हू
मेरे लिए बस में,ट्रेन में
और घर के एक कोने में
एक सीट रिजर्व होती हे
एक सीट ऊपर भी रिजेर्व होती हे
स्वर्ग हो या नरक
कही भी जाऊ, क्या पड़ेगा फर्क
क्योकि इन दोनों लोको का अनुभव
मेने इसी जीवन में ले लिया हे
कभी हंसी ख़ुशी, कभी घुट घुट के
जीवन जिया हे
थका हुआ तन हू
टूटा हुआ मन हू
जी हां में एक सीनियर सिटिजन हू
प्रकृति के नियम भी अजीब हे
वृक्षो से जब पुराने पत्ते गिर जाते हे
तब नए पत्ते आते हे
पर इंसानों में
पुराने पत्ते पहले नए पत्तो को उगाते हे
और नए पत्ते थोड़े बड़े होने पर
पुराने पत्तो को गिराते हे
में भी एसा ही पका हुआ पुराना पत्ता हू
जो कभी भी गिराया जा सकता हू
मेरी वानप्रस्थ की उम्र हे
इसलिए रोज बगीचे में घूमने जाता हू
चिंता और जिम्मेदारियों से मुक्त
सन्यासी सा जीवन बिताता हू
लाफिंग क्लब में हँसता हू
और साँस लेने के लिए करता प्राणायाम योगासन हू
जी हां में एक सीनियर सिटिजन हू

मेरी रूचि


मुझे वो चाँद भला नहीं लगता

जिसे में पा न सकूँ

मुझे वो गीत नहीं रुचते है

जिन्हें में गा न सकूँ

मुझे वो रूप नहीं भाता है

जहाँ में छा न सकूँ

खुदा ने कई खूबसूरत चीजे

बनाई हे दिल जलाने को

दिल के सोये हुए अरमानो को

जगाके भड़का के ,सताने को

देख पकवानों को क्यों ललचाऊ

मिलेगी दाल रोटी खाने को

जब झोपडी में रहना है

महलो के ख्वाब क्यों देखू

सिर्फ मन बहलाने के लिए

में सब्ज बाग क्यों देखू

अपने उपवन की जूही को छोड़

दूसरो का गुलाब क्यों देखू

जो मेरी बाँहों की पहुँच में हो

वो ही बाहों का हर अच्छा हे

जो मेरे होठों पे खुद बा खुद आये

बस वो ही राग अच्छा हे

जो मेरा घर कर रहा रोशन

वो ही टिमटिमाता चिराग अच्छा है

दिनचर्या -बुदापे की


दिनचर्या -बुदापे की
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुढ़ापे में

खोल एल्बम हर फोटो पर आँख गाढ़ते है
कुरते की बाहों से सबकी धूल झाड़ते है
भूल्भुलेया में यादो की खोया करते है
कभी कभी हँसते है या फिर रोया करते है
धुंधली आँखों से ये दुनिया लगती मैली है
लगता है ये जीवन एक अनभूझ पहेली है
सिसक सिसक बौरा जाते ना रहते आपे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में

खोल रेडियो बहुत पुराने गाने सुनते है
फीके खाने के संग तीखे ताने सुनते है
सास बहू के सभी सीरियल देखा करते है
‘बागवान’ सी फिलम देख कर आहे भरते है
बार बार अख़बार चाट कर वक्त बिताते है
डूबा चाय में यादो के कुछ बिस्किट खाते है
एकाकीपन खो जाता है हँसते गाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में

बी.पी.हार्ट, शुगर की गोली, यही नाश्ता है
जितने है भगवान सभी में बड़ी आस्था है
आर्थे राइ टिस हे घुटनों में,चलना भारी है
कथा भागवत टी वी पर ही सुनना जारी है
छड़ी उठा कर सुबह पार्क में टहला करते है
खिलती कलिया फूल देख कर ,बहला करते है
वक्त गुजरता हमदर्दों के संग बतियाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में

याददास्त भी साथ निभाने में कतराती है
ताज़ी नहीं पुरानी बाते मन में छाती है
होता मन उद्विग्न आँख से आंसू बहते है
फिर भी मन की पीर छुपा कर हँसते रहते है
जीवन की आपाधापी में ये सब चलता है
पर अपनों का बेगानापन ज्यादा खलता है
कब तक यादे रखे दबा कर, बंद लिफाफे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में

मोह माया में अब भी ये मन उलझा रहता है
कहता है मष्तिष्क औरये दिल कुछ कहता है
हाथो में जब लिए सुमरनी प्रभु को जपते है
भटके मन में जाने क्या क्या ख्याल उभरते है
नाती,पोते,पोती,बच्चे,याद सताती है
किसको क्या दे, करे वसीयत चिंता खाती है
कितनी देर लगा करती मृत्यु को आते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में

कभी रात को सोते में जब नीद उचटती है
डनलप की गद्दी भी हमको चुभने लगती है
करवट बदल बदल मुश्किल से ही सो पाते है
जाने कैसे गंदे गंदे सपने आते है
अपने जन की यादे आकर जब तड फाती है
मन की पीड़ा आंसू बन कर बह बह जाती है
कितना वक्त लगेगा इस दिल को समझाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में

अच्छे बुरे सभी कर्मो कियादे आती है
सच्चा झूठा,भला बुरा, सब बाते आती है
किसने धोका दिया और किसने अपनाया है
कौन पराया अपना, अपना कौन पराया है
लेखे जोखे का हिसाब जब जाता आँका है
जीवन की बलेंस शीट का बनता खाका है
क्या खोया क्या पाया, कितने रहे मुनाफे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में

badi umar


अपने ही दूरस्थ हो गए
उम्र बड़ी हम पस्त हो गए
थे हम प्रखर सूर्य चमकीले
लगता है अब अस्त हो गए
देखे थे जो हमने मिल कर
वो सब सपने ध्वस्त हो गए
हमको छोड़ किसी कोने में
सब अपने में मस्त हो गए
रोटी, कपडा, खर्चा, पानी
दे कर के आश्वस्त हो गए
अपनों के बेगानेपन की
बीमारी से ग्रस्त हो गए
अब तो जल्दी राम उथले
हम तो इतने त्रस्त हो गए

संत


संत
मन बसंत था कल तक जो अब संत हो गया
अभिलाषा, इच्छाओ का बस अंत हो गया
जब से मेरी प्राण प्रिया ने करी ठिठोली
राम करू क्या बूढ़ा मेरा कंत हो गया

purane chawal


पुराने चावल
पकेगा तो महकेगा खिल खिल के दाना
क्योकि ये चावल पुराना बहुत है
नहीं प्यार करने की हिम्मत बची है
कैसे भी नजरे चुराना बहुत है
कभी पेट में दर्द,खांसी कभी है
सरदर्द का फिर बहाना बहुत है
भले ही हमारी,है ये जेब खाली
तजुरबो का लेकिन खजाना बहुत है