Archive for December, 2010

आओ अब हम तुम मिल जाए


आओ अब हम तुम मिल जाए
नए नए गुल रोज खिलाये
खेले कूदे नाचे गाये
हंसी ख़ुशी से हम मुस्काए
तुम बेसन के तलो पकोड़े
और चाय संग हमतुम खाए
पिक्चर देखे हम कोमेडी
हंस हंस कर दोहरे हो जाए
तुम मुझको मै तुम को देखू
हम क्यों देखे दाये बाए
दिन भर मस्ती करे और फिर
रात पड़े थक कर सो जाये

आओ चैन से नींद ले


आओ चैन से नींद ले
रात के हर प्रहर
बढ़ता ही जा रहा है
कोहरे का कहर
कोहरा बे इमानी का ,
भ्रष्टाचार का
कोहरा आतंक का ,नक्सलवाद का
कोहरा महगाई का छा रहा है
सबको रुला रहा है
हम ये करेगे, हम वो करेगे
करेगे खाख, सिर्फ भाषण देंगे
सारे नेता आँख बंद किये बैठे है
हम भी आँखे मीन्द ले
आओ चैन से नींद ले
प्याज के छिल्को की तरह,
परत दर परत
खुलता ही जा रहा है,
भ्रष्टाचार का पिटारा
क्या करे आम आदमी बिचारा
होगा वो ही जो होना है
फिर काहे का रोना है
हमको कोई नहीं देख रहा है
यही सोच कर हम भी
रेत में मुह छुपा
शतुरमुर्ग के मानिंद ले
आओ चैन से नींद ले


मै भारत का जन मन गण हूँ


मै भारत का जन मन गण हूँ
जो चुनाव में दिया गया था ,निभा नहीं वो आश्वाशन हूँ
या फिर किसी भ्रष्ट नेता का ,स्विस खाते में संचित धन हूँ
कई करोडो के घपले का ,मै टू जी का स्पेक्ट्रम हूँ
कामन वेल्थ ,कमाया सब ने ,उन खेलो का आयोजन हूँ
खुल कर खेल रहा सत्ता का भ्रष्टाचारी गठबंधन हूँ
हर दिन जो बढ़ती जाती है,महगाई की मार, चुभन हूँ
सोसायटी आदर्श जहाँ पर ,आदर्शों का हुआ हनन हूँ
दुशाशन के कारण होता ,मै जनता का चीरहरण हूँ
गठबंधन की मजबूरी में ,मन मसोसता ,मनमोहन हूँ
मै भारत का जन मन गण हूँ
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मै तो बस सूखा सावन हूँ


मै तो बस सूखा सावन हूँ
ना मुरली की तान न राधा ,एसा सूना बृन्दावन हूँ
एक सुंदरी मधुबाला का ,पल पल कर ढलता योवन हूँ
बूँद बूँद आँखों से बहता ,गंगा जमना का संगम हूँ
अपनों का बेगाना पन या सास बहू वाली अनबन हूँ
कृष्ण पक्ष का घटता शशि हूँ या फिर जैसे चन्द्र ग्रहण हूँ
सीखा जहाँ सभी ने चलना ,मै पुरखों का वो आँगन हूँ
आज रक्त में जा घुल बैठा,बातों का वो मीठापन हूँ
गो मुख में जा दुग्ध बनेगा,मै तो एसा सूखा तृण हूँ
भट्टी में तप गया समय की ,तब जाकर निखरा कुंदन हूँ
विस्तृत ज्ञान हो गया विस्मृत ,शेष बचा वो पागलपन हूँ
थका थका सा मेरा तन है ,मै तो बुझा बुझा सा मन हूँ
मै तो बस सूखा सावन हूँ
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आत्म कथ्य


आत्म कथ्य
जो देखा -सो लिखा
जो सोचा – वो लिखा
जो भोगा – वो लिखा
मैंने देखी भीगी पलके
मैंने देखे टूटे सपने
कई पराये ,कितने अपने
कुछ है घनीभूत पीडाए
और व्यथा की कई कथाये
भरी भावना से कविताये
दुःख और हर्ष ,नज़र आएगा
पीड़ित शख्स नज़र आएगा
अपना अक्स नज़र आएगा
मदन मोहन बहेती घोटू

वो बात जवानी वाली थी


वो बात जवानी वाली थी
तुम्हारे कोमल हाथो का
स्पर्श बड़ा रोमांचक था
तन में सिहरन भर देता था
मन में सिहरन भर देता था
कुछ पागलपन भर देता था
और जब गुबार थम जाता था
तब कितनी राहत मिलती थी
अब आई उम्र बुढ़ापे की
तुम भी बूढी, मै भी बूढ़ा
जब पावों में होती पीड़ा
तुम हलके हलके हाथो से
जब मेरे पाँव दबाती हो
सारी थकान मिट जाती है
या फिर झुर्राए हाथों से
तुम मेरी पीठ खुजाती हो
सारी खराश हट जाती है
स्पर्श तुम्हारे हाथों का
अब भी कितनी राहत देता
तुम भी वोही, हम भी वोही
ये सारा असर उमर का है