Archive for January, 2011

संतानों से


याद करें जो तुमको हर पल
उनको भी देदो तुम कुछ पल
जिससे उनका दिल खिल जाए
थोड़ी सी खुशियाँ मिल जाए
उनके ढलते से जीवन को ,
मिले प्यार का थोडा संबल
उनको भी दे दो तुम कुछ पल
आज गर्व से जहाँ खड़े हो
इतने ऊँचे हुए बड़े हो
ये उनका पालन पोषण है
और उनकी ममता का आँचल
उनको भी दे दो तुम कुछ पल
जिनने तुम पर तन मन वारे
प्यार लुटाते जनक तुम्हारे
जिनके आशीर्वाद आज भी
बरस रहें है तुम पर अविरल
याद करे तुमको जो हर पल
उनको भी दे दो तुम कुछ पल

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ओह मिश्र के ग्रेट पिरेमिड


ओह मिश्र के ग्रेट पिरेमिड
तुम वृहद्ध हो ,तुम विशाल हो
तुम मानव के द्वारा निर्मित एक कमाल हो
तुम महान हो , तुम बड़े हो
आसमान में गर्व से ,सर उठाये खड़े हो
आज की प्रगतिशील पीढ़ी की तरह
तुम जितने ऊपर जाते हो
घटते ही जाते हो
तुम भी संवेदनाओं से शून्य हो
तुम्हारा दिल भी पत्थर है
तुम दोनों में बस थोडा सा अंतर है
तुम्हारे अन्दर तुम्हारे निर्माताओं का
मृत शरीर सुरक्षित है
और इस पीड़ी के हृदयों में बसने को
उनके जनकों की आत्माएं तरस रही है
और उनका मृतप्राय शरीर
घर के किसी कोने में ,
पड़ा उपेक्षित है

माँ तुम ऐसी गयी ,गया सब ,खुशियों का संसार


माँ तुम ऐसी गयी ,गया सब ,खुशियों का संसार
तार तार हो बिखर गया है ,ये सारा परिवार
जब तुम थी तो चुम्बक जैसी ,सभी खींचे आते थे
कितनी चहल पहल होती थी ,हंसते थे ,गाते थे
दीवाली की लक्ष्मी पूजा और होली के रंग
कोशिश होती इन मोको पर ,रहें सभी संग संग
साथ साथ मिल कर मनते थे ,सभी तीज त्योंहार
माँ ,तुम ऐसी गयी ,गया सब ,खुशियों का संसार
जब तुम थी तो ,ये घर ,घर था ,अब है तिनका तिनका
टूट गया टुकडो टुकडो में ,कुछ उनका ,कुछ इनका
छोटी मुन्नी ,बड़के भैया,मंझली ,छोटू ,नन्हा
अब तो कोई नहीं आता है ,सब है तनहा तनहा
एक डोर से बाँध रखा था ,तुमने ये घर बार
माँ,तुम ऐसी गयी ,गया सब खुशियों का संसार
भाई भाई के बीच खड़ी है ,नफरत की दीवारे
कोर्ट ,कचहरी,झगडे नोटिस,खिंची हुई तलवारें
लुप्त हो गया ,भाईचारा,लालच के अंधड़ में
ऐसी सेंध लगाई स्वार्थ ने ,खुशियों के इस गढ़ में
माँ तुम रूठी ,टूट गया सब ,गठा हुआ संसार
तार तार हो कर के बिखरा ,ये सारा घर बार
संस्कार की देवी थी तुम ,ममता का आँचल थी
खान प्यार की ,माँ तुम आशीर्वादों का निर्झर थी
सबको राह दिखाती थी तुम ,सुख दुःख और मुश्किल में
तुम सबके दिल में रहती थी ,सभी तुम्हारे दिल में
हरा भरा परिवार वृक्ष था ,माँ तुम थी आधार
माँ, तुम ऐसी गयी ,गया सब ,खुशियों का संसार

आज प्रात की बेला में


आज प्रात की बेला में
मैंने मुहं चूमा उषा का ,किरणों के संग खेला मै
मोती सी शबनम की बूंदे ,हरी घास पर लेटी अल्हड
मस्त समीरण के झोंको से,नाच रही थी कलियाँ चंचल
पंछी नीड़ छोड़ निकले थे,ची ची ची ची चहक रहे थे
खुशबू का आँचल फहराते,फूल गुलाबी महक रहे थे
अभी उबासी लेकर भ्रमरों ने,बस अपनी आँखे खोली थी
तभी डाल पर फुदक फुदक कर ,कुहू कुहू कोयल बोली थी
नव प्रभात की, नवल शिशु सी, सोंधी सोंधी खुशबू आई
आँखे खोल जूही की कलियों ने छुप कर के ली अंगडाई
पुरवैया ने थपकी दी तो ,पारिजात ने पुष्प बिछाये
दूर क्षितिज से सूरज झाँका, वृक्षों पर किसलय मुस्काए
उषा के गालों पर लाली ,छायी प्रिय के मधुर मिलन की
फिर से शुरू हो गयी हलचल ,एक नए दिन की ,जीवन की
भाव विभोर हो गया लख कर ,रूप भोर का अलबेला ,मै
आज प्रात की बेला में

हो सके तो हमें दो गिलास शुद्ध पानी मुहैया कराओ


तुम्हारे वादे गुलाबजामुन की तरह है
जिनमे न गुलाब की खुशबू है
न जामुन का स्वाद
सिंथेटिक मावे के बने गुलाबजामुन
हमें अब रास नहीं आयेगे
गुल हो गया है जो मन ,
उसे गुलाबजामुन कहाँ भायेगे
तुम्हारे आश्वासनों के सड़े हुए ,
मैदे के खमीर से बनी
वादों की कढ़ाई में तली हुई
और टूटे हुए सपनो की चासनी में डूबी हुई
ये टेढ़ी मेढ़ी जलेबियाँ
इतने सालों से खिलाते आ रहे हो
अब नहीं खा पायेगे
हमें डायबिटीज हो गयी है
हमें खस्ता कचोडी खिलाने का वादा मत करो
हमारी हालत यूं ही खस्ता हो गयी है
तुम्हारे भाषण,प्याज के छिलकों की तरह
हर बार परत दर परत खुलते है
पर स्वाद कम ,आंसू ज्यादा लातें है
अब हमें मत बर्गालाओ
कामनवेल्थ गेम में ,बहुत खेल खेल लिए
तुम्हारा तो पेट भर चुका है
हो सके तो हमें
दो गिलास शुद्ध पानी मुहैया कराओ
क्योंकि पेट तो अब पानी से ही भरना पड़ेगा

हम रेल की पटरियां है


लोहे का तन ,कुंठित जीवन
जमीन से जड़ी हुई
दूर दूर पड़ी हुई
जो कभी न मिल पायी
इसी दो सखियाँ है
हाँ ,हम रेल की पटरियां है
कितनो का ही बोझ उठाती
सबको मंजिल तक पहुंचाती
सुनसान जंगलों में
या कस्बों ,शहरों में
साथ साथ भटक रही
पर हमको पता नहीं
हमारी मंजिल कहाँ है
हाँ ,हम रेल की पटरियां है
साथ साथ रह कर भी,
क्या है मजबूरियां
बनी ही रहती है ,
आपस में दूरियां
जिनकी सोच आपस में ,
कभी नहीं मिल पाती
हम ऐसी दो पीढियां है
हाँ हम रेल की पटरियां है

तू अपनी माँ को भूल गया


तू अपनी माँ को भूल गया
जिसने नौ महीने तुझे कोख में,किया अंकुरित ,जनम दिया
छाती के रस से सींच सींच ,पला पोसा और बड़ा किया
तूने सीखा घुटनों चलना,फिर खड़ा हुआ ,मुहं खोला था
माँ हुई ख़ुशी से गदगद थी,जब तू माँ माँ माँ बोला था
तू बिस्तर गीला करता माँ ,गोदी में तुझे उठाती थी
सूखे बिस्तर से तुझे उठा ,खुद गीले में सो जाती थी
दिन दूना रात चोगुना तू, बढ जाए मन्नत करती थी
पढ़ लिख कर बने बड़ा ,सुखमय जीवन हो,चाहत करती थी
तेरे प्रति माँ का अमित स्नेह,अब भी कायम है ,सच्चा है
तू कितना भी बन जाए बड़ा ,माँ को तो लगता बच्चा है
तेरी तारीफ़ करते करते ,जिसकी जुबान ना थकती है
धुंधली धुंधली सी आँखों से,वो राह तुम्हारी तकती है
बस एक बार आ जा मिलने,माँ का मन तुझे बुलाता है
गिर गिर चलना,बढना सीखा ,वो आँगन तुझे बुलाता है
वो तुझसे नहीं मांगती कुछ,बस थोडा प्यार चाहती है
बीमार पड़ी है एक बार ,तेरा दीदार चाहती है
उसका अब तक का स्नेह त्याग,क्या सचमुच यूं ही फिजूल गया
तू अपनी माँ को भूल गया