Archive for March, 2011

ऐसी खूँटी एक चाहिये


इतने दुःख,इतनी विपदायें

परेशानियाँ,दायें, बायें

सोऊ चैन से,इन्हें टांग कर,

ऐसी खूँटी एक चाहिये

कुछ ऐसी तकदीर मिली है

अपनों से ही पीर मिली है

लेप लगा कर ,दर्द मिटे सब

ऐसी बूंटी एक चाहिये

दाह ,जलन,कटुता,बिमारी

हार ,जीत, चिंताएं सारी

जिसको पीकर बिसर जाए सब,

ऐसी घूंटी एक चाहिये

टूटे दिल को जो सहलाये

जीवन में आनंद जगाये

छुई मुई सी ,लाल ,मखमली

वीर बहूटी एक चाहिये

तेरा चुम्बन


मन की प्यास बढ़ा देता है तेरा चुम्बन
तन में आग लगा देता है तेरा चुम्बन
नरम,मखमली,रक्तिम आभा,रस के प्याले
अक्षय मदिरा पात्र,मदभरे अधर तुम्हारे
छू उन्माद जगा देता है तेरा चुम्बन
तन में आग लगा देता है तेरा चुम्बन
तप्त कलश तेरे जब छूते मेरे तन को
होता मन बेचैन,मचलता मधुर मिलन को
प्रीतधार बरसा देता है तेरा चुम्बन
मेरा मन हर्षा देता है तेरा चुम्बन
मिलते तपते अधर,बड़ी ठंडक मिलती है
एक नयी उर्जा ,खुशबू मादक मिलती है
मन को बहला कर सहलाता तेरा चुम्बन
प्यार जगाता है मदमाता तेरा चुम्बन
मेरे भाग जगा देता है तेरा चुम्बन
तन में आग लगा देता है तेरा चुम्बन

अचरज


एक पिरामिड मिश्र देश का,एक भारत का ताज महल है
ये दोनों ही बेमिसाल है,और दुनिया के आश्चर्य है
दोनों का निर्माण कराया ,उनने जो तब करते शासन
कितने जन का खून पसीना,कितने मजदूरों का शोषण
लाखों का धन लुटा कोष से,सिर्फ इसलिए बनी ईमारत
उनके मरने पर दुनिया में,उनके शव रह सकें सुरक्षित
ये बन गए अजूबे लेकिन ,एक अजूबा सबसे भारी
जिनको खबर न अगले पल की,करते बरसों की तैयारी
इन पत्थर दिल राजाओं ने,रचे अजूबे ,जग नश्वर में
अपनी माटी की काया को,रखने पत्थर संगमरमर में
अनजाने नियति नीयत से ,होनी होती बड़ी प्रबल है
एक पिरामिड मिश्र देश का,एक भारत का ताज महल है

वणिक पुत्र


मैंने तुम्हारी महक को,
प्यार की ऊष्मा देकर
अधरों के वाष्प यन्त्र से,
इत्र बना कर,
दिल की शीशी में,एकत्रित कर लिया है,
ता कि उम्र भर खुशबू ले सकूँ
मैंने तुम्हारा यौवन रस,
मधुमख्खी कि तरह,
बूँद बूँद रसपान कर,
दिल के एक कोने में
मधुकोष बना कर,संचित कर लिया है,
ता कि जीवन भर ,रसपान कर सकूँ
मैंने तुम्हारे अंगूरी अधरों से,
तुम्हारी मादकता का आसवन कर
एकत्रित कि गयी मदिरा को,
पर्वतों के शिखरों में,छुपा कर भर दिया है
ताकि उम्र भर पी सकूँ
क्योंकि संचय करना,मेरा रक्त गुण है
मै एक वणिक पुत्र हूँ

आ तेरा श्रृंगार करूँ मै


आ तेरा श्रृंगार करूँ मै

तुझको जी भर प्यार करूँ मै

बूढा तन,सल भरी उंगलियाँ,

हीरा जड़ित अंगूठी उनमे

दोपहरी की चमक आ गयी ,

हो जैसे ढलते सूरज में

जगमग मोती की लड़ियों से ,

आजा तेरी मांग भरूं मै

आ तेरा श्रृंगार करूँ मै

बूढ़े हाथों की कलाई पर

स्वर्णिम कंगन ,खन खन करते

टहनी पर जैसे पलाश की

सुन्दर फूल केसरी झरते

इस पतझड़ के मौसम में भी

आ बासन्ती रंग भरूं मै

आ तेरा श्रृंगार करूँ मै

मणि माला का बोझ ग्रिव्हा पर,

और करघनी झुकी कमर में

नयी नवेली सी लगने का

शौक चढ़ा है ,बढ़ी उमर में

अपनी धुंधली सी आँखों से

आ तेरा दीदार करूँ मै

आ तेरा श्रृंगार करूँ मै

खेलो होली


घरवालों संग खेलो होली ,घरवाली संग खेलो होली
साला तो शैतान बहुत है ,तुम साली संग खेलो होली
जिनको सदा देखते हो तुम ,हसरत भरी हुई नज़रों से
जवां पड़ोसन ,प्यारी समधन,दिलवाली संग खेलो होली
यूँ तो सलहज सहज नहीं है,बस होली का ही मौका है,
कस कर पकड़ो रंग लगा,मतवाली के संग खेलो होली
लेकर रंग भरी पिचकारी,तन को इतना गीला करदो,
चिपके वस्त्र दिखे सब कुछ उस छवि प्यारी संग खेलो होली

अबकी होली


अबकी होली में हो जाये,कुछ एसा अदभुत चमत्कार
हो जाये भ्रष्टाचार स्वाहा, महगाई,झगड़े, लूटमार
सब लाज शर्म को छोड़ छाड़,हम करें प्रेम से छेड़ छाड़
गौरी के गोरे गालों पर ,अपने हाथों से मल गुलाल
जा लगे रंग,महके अनंग,हर अंग अंग हो सरोबार
इस मस्ती में,हर बस्ती में,बस जाये केवल प्यार प्यार
दुर्भाव हटे,कटुता सिमटे,हो भातृभाव का बस प्रचार
अबकी होली में हो जाये,कुछ एसा अदभुत चमत्कार