Archive for April, 2011

नारी शक्ति


नारी शक्ति
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नारी,शक्ति रूपा प्रचंड होती है
सास रूप में हो या बहू रूप में,
दोनों में करंट होती है
और अक्सर
एक की करेंट पोसिटिव,
और एक की करंट निगेटिव होती है
ये दोनों लाइव वायर ,
जब साथ साथ रहते है
लोगबाग कहते है
इनके टकराने से,
अच्छे अच्छे अच्छे घरों का फ्यूज उड़ जाता है
कई बार इतनी स्पार्किंग होती है,
कि घर तक जल जाता है
पर जब इन तारों पर
पुत्र प्रेम का ,
और पति प्यार का इन्सुलेशन चढ़ जाता है
तो इनके करंट से,
प्यार का बल्ब जल जाता है
और सारा घर रोशन हो जाता है

मदन मोहन बहेती ‘घोटू’

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मै बदल गया


मै बदल गया
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मैंने तुमसे जब शादी की ,तब बड़ा मस्त मौला था मै
तुम जैसा कहती ,मै करता ,सचमुच कितना भोला था मै
तुम ये न करो ,तुम यू न करो,ऐसे पियो,यूँ खाओ तुम
ऐसे ऐसे कपडे पहनो, और ऐसे बाल बनाओ तुम
,मै अच्छा भला आदमी था,तुमने क्या से क्या कर डाला
तुम्हारी टोका टाकी ने ,मेरा व्यक्तित्व बदल डाला
आज्ञाकारी पति बन कर जब ,मै हूँ बिलकुल ही बदल गया
अब तुम्ही शिकायत करती हो, मै पहले जैसा नहीं रहा

मदन मोहन बहेती ‘घोटू’

विश्वामित्र


विश्वामित्र
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मै विश्वामित्र हूँ
तपस्वी हूँ
ज्ञानी हूँ ,ध्यानी हूँ
पर मुझे बहुत क्रोध आता है
कोई मेरी अवहेलना करे ,
तो चेहरा तमतमाता है
मेरे क्रोध के कारण,
दुष्यंत शकुंतला को भूल जाता है
पर मै भी हाड मांस का पुतला हूँ,
मुझ में भी कमजोरियां है
अभी तक मेरा तप भंग नहीं हुआ है
कुछ मजबूरियां है
मगर फिर भी आस है
पूरा विश्वास है
कभी तो कोई मधुमास मुस्केरायेगा
जो किसी मेनका को लाएगा
ये तप ,ये ध्यान,
सब बातें है दिखने की
मुझे तो बस प्रतीक्षा है ,
किसी मेनका के आने की

मदन मोहन बहेती ‘घोटू’

एक नारी का अंतरद्वंद


एक नारी का अंतरद्वंद
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मेरा धृष्ट राज
यदि काम ,क्रोध,लोभ, मोह ,में अँधा है,
तो क्या मै भी गांधारी की तरह,
अपनी आँखों पर पट्टी बांध लूं ?
मेरा लक्ष्मण,
अपने भ्राता की सेवा में,
वन वन भटके,
और मै उर्मिला की तरह,
अपने यौवन के चौदह वर्ष
विरह के आंसुवों में भीगती रहूँ ?
अगर कोई इन्द्र,
मेरे पति गौतम का रूप धर,
मेरे साथ छल कपट करे,
तो क्या मै पत्थर की अहिल्या बन जाऊ ?
कोई अर्जुन मुझे स्वयंबर में जीते,
और मै अपनी सास के कहने पर,
पांच पांडव भ्राताओं की,
पत्नी बन,बंट जाऊ?
तो मै क्यों नहीं कुंती की तरह,
कवांरेपन में कर्ण की माँ,
या पाण्डु की पत्नी होने पर भी,
धर्मराज ,इंद्र,और पवन का आव्हान कर,
तीन पुत्रों की माँ नहीं बन सकती?

मदन मोहन बहेती ‘घोटू’

मई में


मई में
एक सुरमई आँखों वाली से
सुर मिले
उसकी प्रेममयी बातों ने
प्रेम का मय पान कराया
फिर आनंदमयी जिंदगी के सपने देखे
परिणाम में परिणय हुआ
और अगली मई तक
वो प्रेममयी, आनंदमयी,सुरमई आँखों वाली
ममतामयी बन गयी

जरुरत–शहादत की


जरुरत–शहादत की
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राजनीती के गलियारे,
अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण
बहुत सकड़े रह गए है
और अब आवश्यकता हो गयी है,
उन्हें चोडा करने की
और सड़कों को चोडा करने के लिए
पुराने बड़े बड़े वृक्षों को
शहादत देनी पड़ती है

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

बिठोडा


बिठोडा
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गावं के आसपास
या सड़क के किनारे
जब भी देखता हूँ
गोबर के बने ,झोपड़ीनुमा
छोटे छोटे से घर
जिनमे सलीके से,
जमा कर रखे हुए होते है
गोबर के उपले या कंडे
और जिनकी दीवारों पर,
किसी कार्यकुशल गृहणी के
हाथों के छापों की सजावट होती है
वो हाथ ,जिनमे मेहंदी रचती है
वो हाथ ,जो सिहरन पैदा करतें है
वो हाथ,जो रोटियां सकतें है
उन्ही हाथों ने,गोबर को थेप थेप कर
ये उपले या कंडे गढ़ें है
जिन्हें सुखा कर रखती है वो ,
गोबर के बने इन बिठोड़ो में
ताकि बरसात के मौसम में
इनसे चूल्हा जला कर
सेक सके रोटियां
पेट की आग बुझाने को
और बची हुई रख से
मांझ सके घर के बर्तन
इन बिठोड़ो को देख कर,
याद आतें है मिश्र देश के पिरेमिड
जिन्हें बनाया गया था,
उपयोग हीन शवों को सुरक्षित रखने के लिए
तब लगता है की लोगों की सोच और संस्कृति में
कितना अंतर होता है
मदन मोहन बहेती ‘घोटू’