Archive for July, 2011

कल रात मैंने एक सपना देखा


कल रात मैंने एक सपना देखा
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कल रात मैंने एक सपना देखा,
मै रेगिस्तान में भाग रहा हूँ
और भागते भागते भटक गया हूँ
फिर थक कर गिर पड़ा हूँ
मेरे हाथ कट कर,
मेरे शरीर से छिटक कर,
दूर हो गए है
मेरे होंठ,प्यास से सूखने लगे है
और मेरी आँखों पर पट्टी बंधी है
कुछ हाथ,मदद के लिए ,मेरी तरफ,
बढ़ने की कोशिश कर रहे है,
पर पहुँच नहीं पा रहे है
तभी आसमान से एक परी उतरती है
वह मुझे सहलाती है,
शीतल जल पिलाती है
और मेरी आँखों की पट्टी खोलती है
मैंने देखा,एक जादू सा हो गया है
मेरे हाथ मेरे शरीर से फिर जा जुड़े है
मदद करने वाले हाथों ने,
मेरे करीब आकर,मुझे उठाया है,
और मरुस्थल में अचानक,
हरियाली छा गयी है ,
और फूल खिलने लगे है
क्या था ये सपना?
मेरी आँखें खुली तो मैंने देखा,
रेगिस्तान में मेरा भटकना,
कोरी मृग तृष्णा थी ,
वो परी मेरी पत्नी थी
वो हाथ, मेरे बच्चे थे
,मेरे माँ बाप,भाई बहन और मित्रों के हाथ,
मेरी मदद को बढ़ना चाह रहे थे
पर मेरी आँखों पर,
अहम् और अहंकार की पट्टी बंधी थी,
जिसके खुलते ही,
सब फिर से मिल गए
और रेगिस्तान में फूलखिल गए

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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कहाँ खो गया वो प्यारा बचपन ?


बचपन की बातें,
जब याद आती है
बड़ा तडफाती है
बरषा के बहते पानी में ,
कागज की नावों के ,
पीछे दोड़ने वाला, मै,
अब कागज के नोटों के ,
पीछे दोड़ता रहता हूँ
शाम ढले,छत पर बैठ,
नीड़ में लौटते हुए पंछियों को गिनना,
और बाद में उगते हुए तारों की गिनती करना ,
जिसका नित्य कर्म होता था,
अब नोट गिनने में इतना व्यस्त हो गया है,
कि उसके पास,
प्रकृति के इस अद्भुत नज़ारे को ,
देखने का समय ही नहीं है
माँ का आँचल पकड़,
चाँद खिलौना पाने कि जिद करनेवाला,
अब खुद व्यापार कि दुनिया में,
सूरज,चाँद बन कर चमकने को आतुर है
ठुमुक ठुमुक कर ,धीरे धीरे चलना सीख कर,
जीवन कि दौड़ में,
सबसे आगे निकलने कि होड़ में,
अधीर रहता है
माँ से जिद करके,
माखन मिश्री खाने वाला,
अब न तो माखन खा सकता है न मिश्री,
क्योंकि,क्लोरोसट्राल और शुगर,
दोनों ही बड़े हुए है,
क्यों छाया है मुझमे ये पागलपन?
क्या ये ही है जीवन?
कहाँ खो गया वो प्यारा बचपन ?

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

आज गिरी फिर बिजली


आज गिरी फिर बिजली
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जुल्फों को फैला कर,
तुम थोडा मुस्काई
आज घिरी फिर बदली
आज गिरी फिर बिजली
भीगे से से बालों को ,
तुमने जब झटकाया
पानी की बूंदों से,
सावन सा बरसाया
हुई ऋतू फिर पगली
आज गिरी फिर बिजली
गीली हो चिपक गयी,
गौरी के तन चोली
गालों पर बिखर गयी,
शर्मीली रांगोली
पिया रंग ,फिर रंग ली
आज गिरी फिर बिजली
देख संवारता तुमको,
आइना हर्षाया
ताज़ा सा खिला रूप,
लख कर मन मुस्काया
मिलन आस फिर जग ली
आज गिरी फिर बिजली

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

तुम, तुम हो


तुम, तुम हो
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गर्मी में शीतलता,
सर्दी में ऊष्मा
बारिश में भीगापन,
बासंती सुषमा
हर ऋतू में मनभाती
मुस्काती,मदमाती ,
मस्ती की धुन हो
तुम ,तुम हो
ग्रीष्म में शिमला की,
वादियों सी शीतल
बरफ की चुस्की की तरह,
रसभरी,मनहर
शीतल जल की घूँट की तरह,
तृप्ति प्रदायिनी
चांदनी में बिछी सफ़ेद चादरों सी,
सुहावनी
आम के फलों की तरह,
मीठी और रसीली तुम हो
तुम,तुम हो
सर्दी में जयपुर की गुदगुदी,
रजाई सी सुहाती
सूरज की गुनगुनी ,
धूप सी मनभाती
मक्की की रोटी और सरसों के ,
साग जैसी स्वाद में
गरम अंगीठी की तरह तपाती,
ठिठुराती रात में,
रस की खीर,गरम जलेबी,
या रसीला गुलाबजामुन हो
तुम,तुम हो
वर्षा की ऋतू में सावन की,
बरसती फुहार
जुल्फों की बदली से,
आँखों की बिजली की चमकार
आँख मिचोली खेलती हुई,
सूरज की किरण
या गरम चाय के साथ,
पकोड़ी गरम गरम
दूर दूर तक फैली हरियाली,
भीगा हुआ मौसम हो
तुम, तुम हो
बासंती ऋतू की,
मस्त मस्त बहार
प्यार भरी, होली के,
रंगों की बौछार
फूलों की क्यारियों की,
गमक और महक
कोयल की कुहू कुहू,
पंछियों की चहक
वृक्षों के नवल पात सी कोमल,
पलाश सा,रंगीला फागुन हो
तुम ,तुम हो

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

एक मधुमख्खी, एक है मख्खी


एक मधुमख्खी, एक है मख्खी
एक नस्ल की है दोनों पर,एक अनुशाषित,एक है झक्की
एक मधुमख्खी,एक है मख्खी
छोटी मख्खी में छोटापन,दिन भर भीं भीं करती फिरती
बहुत सताती,उड़ उड़ जाती,चाय भरे प्याले में गिरती
कभी गाल पर ,कभी नाक पर,बार बार बैठा करती है
मार भगाओ तो उड़ जाती,लेकिन चोट तुम्हे लगती है
परेशान सबको करती है,और फैलाती है बीमारी
ना है कोई ठौर ठिकाना,फिरती रहती मारी मारी
है शालीन मगर मधुमख्खी,छत्ते से उड़,जा फूलों पर
मधुकोष में संचय करती,रस की बूँदें लाती है भर
करे छेड़खानी जो कोई,तो उसके पीछे पड़ जाती
अपनी सारी बहनों के संग,उसे काटती,मज़ा चखाती
कितनी सुन्दर जीवन पध्दिती,सब मिलकर श्रम करती दिनभर
होता जब परिवार संगठित,तो मिठास से भरता है घर
लेकिन इनकी छोटी बहना,मख्खी है पूरी आवारा
कभी मिठाई,कभी गंदगी,इधर उधर मुंह करती मारा
कहने को दोनों बहने पर,दोनों में कितना है अंतर
एक चखाती मधुर मधु है,और एक बीमारी का घर
ये गुण सभी संगठन के है,महिमा अनुशाषित जीवन की
एक मधुमख्खी,एक है मख्खी

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

हम सत्तर के


हम सत्तर के
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हम सत्तर के
हम हस्ताक्षर बीते कल के
हम सत्तर के
कोई समझे अनुभव के घट
कोई समझे कूढा करकट
बीच अधर में लटके है हम,
नहीं इधर के ,नहीं उधर के
हम सत्तर के
कभी तेज थे,बड़े प्रखर थे
उजियारा करते दिन भर थे
अब भी लिए सुनहरी आभा,
ढलते सूरज अस्ताचल के
हम सत्तर के
याद आते वो दिन रह रह के
हम भी महके,हम भी चहके
यौवन था तो खूब उठाया,
मज़ा जिंदगी का जी भरके
हम सत्तर के
पीड़ा दी टूटे सपनो ने
हम को बाँट दिया अपनों ने
किस से करें शिकायत अपनी,
अब न घांट के और न घर के
हम सत्तर के
उम्र बढ़ी अब तन है जर्जर
लेकिन नहीं किसी पर निर्भर
स्वाभिमान से जीवन जीते,
आभारी है परमेश्वर के
हम सत्तर के

मदन मोहन बहेती ‘घोटू’

राज़-कोमल गालों का


राज़-कोमल गालों का
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होली के अवसर पर पर,
समधन के गालों पर
जब मैंने लगायी गुलाल
इन्फ्रारेड लाली से,
लाल हो गए उनके गाल,
मैंने कहा कमाल है
इस उम्र में भी,
कितने कोमल और चिकने,
आपके गाल है
समधन जी मुस्काई
थोड़ी सी सकुचाई,
और बोली शरमा कर
आपको बताती हूँ आज
अपने कोमल गालों का राज़
मै रोज अपने गालों को,
‘जोनसन बेबी सोप ‘से धोती हूँ,
और गालों पर लगाती हूँ,
‘जोनसन बेबी पावडर’
इसीलिए मेरी त्वचा,
है बच्चों सी कोमल

मदन मोहन बहेती ‘घोटू’