Archive for August, 2011

हमें माफ़ करना नेताजी


हम भारत माता के बेटे,देश हमारा अपना है
भ्रष्टाचार मुक्तं हो भारत,यही हमारा सपना है
पिछली बार आप जब हमसे,बोट मांगने आये थे
कई किये थे हमसे वादे,क्या क्या सपन दिखाए थे
दूर गरीबी कर देंगे हम,कम कर देंगे मंहगाई
लेकिन सत्ता में आने पर,तुमने शकल न दिखलाई
मंहगाई दो गुना बढ़ गयी,सब चीजों के दाम बढे
भ्रष्टाचार और घोटाले,हुए देश में बड़े बड़े
मंहगाई पर रोक लगाने,जब जब जनता चिल्लाई
‘नहीं कोई जादू की छड़ी है,दूर करे जो मंहगाई’
एसा कह कर ,तुमने तो बस,अपना पल्ला झाड़ दिया
आन्दोलन जब किया ,रात को,तुमने छुप कर वार किया
जनता की जायज मागों के,तुम विरोध में अड़े हुए
अरे तुम्हारे कई मंत्री ,हैं जेलों में पड़े हुए
सत्याग्रह और आन्दोलन में,बाधा सदा लगाये हो
धिक् है तुमको,अब किस मुंह से,बोट माँगने आये हो
हमें माफ़ करना नेताजी,तुमको बोट नहीं देंगे
किसी साफ़ सुथरी छवि वाले ,को हम संसद भेजेंगे

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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मेरी बीबी,बदली सी है


मेरी बीबी,बदली सी है
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बहुत गरजती है पहले ,फिर रस बरसाती
मेरी बीबी इसी तरह से प्यार जताती
बिजली सी कड़का करती है,बहुत कड़क है
माटी जैसी मगर मुलायम,अन्दर तक है
दग्ध ह्रदय का ताप,पीर है सब हर लेती
मुस्का,प्यार फुहार,प्रेम से बरसा देती
भिगा,प्रेम में, पागल करती,खुद हो पगली
मेरी बीबी,प्यार भरी है,सुख की बदली
यही कड़कपन,गर्जन,मन को लगे है भली
बदला सब कुछ,उम्र ,ज़माना,ये ना बदली

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

आदमी,संभल संभल जाता है


आदमी,संभल संभल जाता है
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कभी शर्म के मारे
कभी दर्द के मारे
दुःख और वेदना में
प्यार की उत्तेजना में
आदमी ,पिघल पिघल जाता है
पडोसी की प्रगति देख
दोस्त की सुन्दर बीबी देख
प्यार में दीवाने सा
शमा पर परवाने सा
आदमी,जल जल जल जाता है
गर्मी में पानी देख
मचलती जवानी देख
भूख में खाने को
हुस्न देख पाने को
आदमी मचल मचल जाता है
प्यार भरी भाषा से
अच्छे दिन की आशा से
सुन्दर सी हिरोइन
देख ,मधुर सपने बुन
आदमी,बहल बहल जाता है
प्यार में सब खोकर
लगती है जब ठोकर
अपनों के दिए दुःख से
और हवाओं के रुख से
आदमी संभल संभल जाता है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

हुंकार


हुंकार
——
अब सड़कों पर उतर आई है,जनता भर कर क्रोध में
लोकपाल बिल लाना होगा,भ्रष्टाचार विरोध में
तम्हे चुना,संसद में भेजा,मान तुम्हारे वादों को
समझ नहीं पायी थी जनता,इतने भष्ट इरादों को
तुमने सत्ता में आते ही,जी भर लूट खसोट करी
कोई करे क्या,राज्य कोष को,लगे लूटने जब प्रहरी
जनसेवा को भूल ,लिप्त तुम थे आमोद प्रमोद में
अब सड़कों पर उतर आई है जनता भर कर क्रोध में
कई करोड़ों लूट ले गया,राजा अपनी गाडी में
खेल खेल में,कई करोड़ों ,लूट लिए कलमाड़ी ने
आदर्शों की सोसाइटी में,आदर्शों का हनन हुआ
भष्टाचार,लूट,घोटाले,रोज रोज का चलन हुआ
कठपुतली बन,नाचे तुम,पूंजीपतियों की गोद में
अब सड़कों पर उतर आई है जनता भर कर क्रोध में
सुरसा से मुख सी मंहगाई,रोज रोज बढती जाती
कैसे नेता हो जो तुमको,ये सब नज़र नहीं आती
काबू इसे नहीं कर सकते,कहते हो,मजबूरी है
नहीं पास में हाथ तुम्हारे,कोई जादू की छड़ी है
बहुत त्रसित है और दुखी है,जनता है आक्रोश में
अब सड़कों पर उतर आई है,जनता भर आक्रोश में
लूट देश का पैसा कितना,स्विस बेंकों में भेज दिया
पास मगर चालीस बरसों में,लोकपाल बिल नहीं किया
शोषक जब होती है सत्ता,जन आक्रोश उमड़ता है
मिश्र,लीबिया सा गद्दी को,छोड़ भागना पड़ता है
देखो जन जन,लोग करोड़ों,अब सब हुए विरोध में
अब सड़कों पर उतर आई है,जनता भर आक्रोश में
लोकपाल बिल लाना होया,भ्रष्टाचार विरोध में

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

साड़ी


साड़ी
—–
कई बार मै सोचा करता हूँ रातों में
नारी नर से अग्रणीय क्यों सब बातों में
घर घर वह देवी सी क्यों पूजी जाती है
नर नौकर पर नारी रानी कहलाती है
इसका कारण मुझे समझ में अब आया है
शायद यह सब केवल साडी की माया है
साडी,जी हाँ,किन्तु आप चकराते क्यों है
साडी देखी उधर नज़र ललचाते क्यों है
साडी ना,साडी वाली के गुनगाहक है
साडी को कर रहे तिरस्कृत ये नाहक है
सचमुच ही हम पुरुष लोग है बड़े अनाड़ी
अभी तलक पहचान ना पाए ,क्या है साडी
पेंट कोट के इस लफड़े में पड़े हुए हैं
झूंठे फेशन के चक्कर में अड़े हुए है
अरे पेंट के बटन टूटते धोबी के घर
और पाजामे का नाड़ा भी होता बाहर
टूटे बटन सियो,नाड़े का फिर हंगामा
बतलाओ,साडी अच्छी या पेंट पाजामा
दोनों टांगें बिछुड़ा करती पाजामे में
दरजी का खर्चा होता है सिलवाने में
साडी मिला रही टांगों को ,वह भी ढक कर
निश्चित ही साडी ही है इन सब से बेहतर
साडी,गागर,जिसमे सागर भरा हुआ है
इतने गुण है ,कि हम सब का भला हुआ है
मौका पड़ने पर चादर भी बन जाती है
खूब बिछाओ,ओढो,सभी काम आती है
‘करटन’ सा लटका सकते हो दरवाजे पर
सब्जी भी तुम ला सकते हो झोली भर कर
गर्मी में आँचल का फेन बना सकते हो
बिन रुमाल के भी तुम काम चला सकते हो
झगडे कि नौबत आये तो कमर कसोगे
मौके पर फांसी का फंदा बांध सकोगे
तन ढकता है,मक्खी मच्छर दूर भगेंगे
और फट गयी,तो दो पेटीकोट बनेंगे
इतनी अच्छी,फिर भी फेशन कहलाती है
इसीलिए तो साडी सबके मन भाती है
जब गलती होती तो नाम प्रभू का लेते
पर अब गलती करने पर हम’सारी’ कहते
तो क्या ये सारी या साडी देवीजी है
शायद इसीलिए नारी इन पर रीझी है
जितनी देवी कि तस्वीरें पड़ी दिखायी
कोई भी स्कर्ट धारिणी नज़र ना आयी
हो सकता है साडी ही पूजी जाती हो
या साडी के कारण वो देवी कहलाती हो
कुछ भी हो जी ,साडी सचमुच,’दी ग्रेट’है
दुःख में देती काम,मनुज की बड़ी ‘पेट’ है
दुःख में राजा नल के आयी कौन अगाड़ी?
साथी थी वह दमयंती की आधी साडी
चीर हरण के समय द्रोपदी पर जब बीती
लाज रखी उसकी वह भी तो साडी ही थी
यह पुराण की कथा कह रही बन कर ज्योति
पांच पति से बढ़ कर है एक साडी होती
इतनी बातें सोच आज आया हूँ कहने
मेरे पुरुष दोस्तों,हम भी साडी पहने
सच कहता हूँ,सुख और सुविधा हो जायेगी
साडी लख,साडी वाली भी ढिग आएगी
पेंट कोट में कसे कसे रहने के बदले
साडी में हम हो जायेंगे उरले,पुरले
बचत योजना है ये,खर्चा घट जायेगा
दरजी का,धोबी का खर्चा कट जायेगा
आधा दर्जन साडी घर में सिर्फ रखेंगे
उलट पुलट कर मियां बीबी पहन सकेंगे
होगी इतनी बचत,योजना सफल बनेगी
खुद साडी लायेंगे,बीबी और मनेगी
एक ड्रेस में इक्वल होंगे सब नर नारी
बहुत बोअर कर दिया आपको,अच्छा,सारी

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

वो लेट क्यों आते है?


वो लेट क्यों आते है?
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कुछ लोग पार्टियों में,
हमेशा देर से आते है
और सबका अटेंशन पाते है
उनका ये सोचना है,
कि सजने सँवारने में इतना टाइम लगाओ
लतेस्ट फेशन के कपड़ों में,पार्टी में जाओ
और देखने वाले हों बस
केवल आठ या दस
तो बताओ आपको क्या मज़ा आएगा?
सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा
मज़ा तो तब है,जब आपकी एंट्री हो
चारों तरफ अच्छी जेन्ट्री हो
पचासों लोगों कि निगाहें
आप पर आकर ठहर जाए
हर कोई आपसे मिलना चाहेगा
आपका सजना संवारना सफल हो जाएगा
जब पार्टी शबाब पर होती है
आपकी आमद गुलाब सी होती है
लेट आने पर मिलती है सभी कि अटेंशन
अरे ये तो है प्रकृति का नियम
क्योंकि जब पैदा होता इंसान है
तो होते दो हाथ,दो पैर,आँखें और कान है
पर शरीर के कुछ अंग जो देर से आते है
तो सबसे ज्यादा अटेंशन पाते है
जैसे मर्दों कि दाड़ी मूंछे,लेट आती है
और औरतों के यौवन का उभार लेट आता है
मन को कितना लुभाता है
ये ही वो चिन्ह है कि जिनको,
जवानी कि पहचान कहा जाता है
लेट आना प्रतीक है यौवन का,
खुद को वो जवान दिखलाते है
इसीलिये ही वो हर पार्टी में लेट आते है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

इंटरव्यू -कृष्ण कन्हैया से


इंटरव्यू -कृष्ण कन्हैया से
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कल मैंने डेयरी पर देखा
हुलिया एक अजीब ,अनोखा
लम्बे बाल लिया काँधे था
सर पर मोर पंख बांधे था
मैंने उसको हिप्पी जाना
पर लगता था कुछ पहचाना
आखिर मैंने पूछ ही डाला
क्या है भैया नाम तुम्हारा?
बोला बड़ा अचम्भा लाये
मुझको तुम पहचान न पाये
पूजो रोज़ जिसे तुम भैया
मै गोकुल का किशन कन्हैया
मै बोला कान्हा,जय कृष्णा
दूर करी नैनों की तृष्णा
धन्य हुआ जो दर्शन पाया
लेकिन नहीं समझ में आया
‘क्यू’ में यूं क्यूं आप खड़े है
क्या राधा से आज लड़े है?
बोले ना ये बात नहीं है
राधा जी तो साथ नहीं है
मै तो आया ऐसे ही था
हाल जानने इस धरती का
इतने में ही भूख लग गयी
दिखा कहीं ना दूध या दही
लोगों ने यह ठौर बताया
पता पूछता हूँ मै आया
मै बोला प्रभु धन्य भाग है
हमसे कितना अनुराग है
मुझको सेवा का अवसर दो
मेरी कुटिया पवित्र करदो
नहीं विदुर की पत्नी जैसे
खिलवाऊँ कैले के छिलके
बल्कि असली दूध मिलेगा
और अमूल का मख्खन होगा
‘बटर टोस्ट ‘ के साथ खाइए
भगवन मेरे साथ आइये
मै उनको अपने घर लाया
बैठाया,जलपान कराया
फिर बोला उपकार करो प्रभु
थोडा सा इंटरव्यू दो प्रभु
बोले माफ़ करो तुम भैया
मेरे पास ना टका,रुपैया
चावल खाए सुदामा के थे
जो भी था,उसको डाला दे
अब खाकर मख्खन तुम्हारा
ये गलती ना करूं दुबारा
कुछ भी मेरे पास नहीं है
मै बोला ये बात नहीं है
मेरा मतलब इतना केवल
दे दो कुछ प्रश्नों के उत्तर
बरसों बाद आप है आये
कैसा तुमको यहाँ लगा है ?
बोले भैया,गया ज़माना
अब क्या गाऊं गीत पुराना
ना वो गोकुल,ना वो गायें
नहीं गोपियाँ,क्या बतलाये
पहले दूध दही था बहता
अब बोतल,पाउच में रहता
पहले जब माखन की हंडिया
लेकर जाती गोपी,सखिंया
मै उनको छेड़ा करता था
हंडीयाये फोड़ा करता था
अब छेड़ूं तो क्या बतलाऊं
सर पर कई सेंडिल खाऊं
अब वो प्यारे वक़्त को गए
ग्वाले भी होशियार हो गए
सारा दूध टिनो में भर कर
बेच रहे रख साईकिल पर
और गोपियाँ अपने घर में
खुश है अपने ट्रांजिस्टर में
सुनती हैं जब फ़िल्मी गाने
कौन सुने मुरली की ताने?
क्या बतलाऊ तुमको भैया
सूख गयी है जमुना मैया
घर घर में बाथरूम हो गए
चीर हरण के चांस खो गए
मैंने उन्हें टोक ही डाला
माफ़ करो नंदजी के लाला
आलोचक है निंदा करते
चीर हरण थे तुम क्यों करते?
कृष्ण कन्हैया बोले झट से
मै ना डरता आलोचक से
चीर हरण यदि मै ना करता
तो बतलाओ कैसे रखता
लाज द्रोपदी की दुनिया में
चीर बढाता भरी सभा में
मेरे पास स्टोक ना होता
तो बतलाओ फिर क्या होता?
चीर हरण कर कर मै लाया
मैंने था स्टोक बढाया
तो मौके पर काम आ गया
मेरा कितना नाम छा गया
वैसे कई चीज ऐसी है
जो अब भी पहले जैसी है
राजनीती का रंग वही है
उल्टा सीधा ढंग वही है
नेता चुन दिल्ली जाते है
लेकिन कभी नहीं आते है
लेने खबर क्षेत्र की अपने
जैसे कभी किया था हमने
गोकुल से चुन मथुरा आया
लेकिन कभी लौट ना पाया
इतना उलझ गया वैभव से
भेजा सन्देशा उद्धव से
पहले भी संयुक्त कई दल
कौरव जैसे बने बढा बल
पर पांडव से युद्ध कराया
ये है राजनीती की माया
अच्छा देर हुई बंधुवर
मुझको जाना है अपने घर
इतने में ही मुझे सुनाया
जागो,कितना दिन चढ़ आया
श्रीमती जी जगा रही थी
मेरा सपना भगा रही थी

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’