इंटरव्यू -कृष्ण कन्हैया से
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कल मैंने डेयरी पर देखा
हुलिया एक अजीब ,अनोखा
लम्बे बाल लिया काँधे था
सर पर मोर पंख बांधे था
मैंने उसको हिप्पी जाना
पर लगता था कुछ पहचाना
आखिर मैंने पूछ ही डाला
क्या है भैया नाम तुम्हारा?
बोला बड़ा अचम्भा लाये
मुझको तुम पहचान न पाये
पूजो रोज़ जिसे तुम भैया
मै गोकुल का किशन कन्हैया
मै बोला कान्हा,जय कृष्णा
दूर करी नैनों की तृष्णा
धन्य हुआ जो दर्शन पाया
लेकिन नहीं समझ में आया
‘क्यू’ में यूं क्यूं आप खड़े है
क्या राधा से आज लड़े है?
बोले ना ये बात नहीं है
राधा जी तो साथ नहीं है
मै तो आया ऐसे ही था
हाल जानने इस धरती का
इतने में ही भूख लग गयी
दिखा कहीं ना दूध या दही
लोगों ने यह ठौर बताया
पता पूछता हूँ मै आया
मै बोला प्रभु धन्य भाग है
हमसे कितना अनुराग है
मुझको सेवा का अवसर दो
मेरी कुटिया पवित्र करदो
नहीं विदुर की पत्नी जैसे
खिलवाऊँ कैले के छिलके
बल्कि असली दूध मिलेगा
और अमूल का मख्खन होगा
‘बटर टोस्ट ‘ के साथ खाइए
भगवन मेरे साथ आइये
मै उनको अपने घर लाया
बैठाया,जलपान कराया
फिर बोला उपकार करो प्रभु
थोडा सा इंटरव्यू दो प्रभु
बोले माफ़ करो तुम भैया
मेरे पास ना टका,रुपैया
चावल खाए सुदामा के थे
जो भी था,उसको डाला दे
अब खाकर मख्खन तुम्हारा
ये गलती ना करूं दुबारा
कुछ भी मेरे पास नहीं है
मै बोला ये बात नहीं है
मेरा मतलब इतना केवल
दे दो कुछ प्रश्नों के उत्तर
बरसों बाद आप है आये
कैसा तुमको यहाँ लगा है ?
बोले भैया,गया ज़माना
अब क्या गाऊं गीत पुराना
ना वो गोकुल,ना वो गायें
नहीं गोपियाँ,क्या बतलाये
पहले दूध दही था बहता
अब बोतल,पाउच में रहता
पहले जब माखन की हंडिया
लेकर जाती गोपी,सखिंया
मै उनको छेड़ा करता था
हंडीयाये फोड़ा करता था
अब छेड़ूं तो क्या बतलाऊं
सर पर कई सेंडिल खाऊं
अब वो प्यारे वक़्त को गए
ग्वाले भी होशियार हो गए
सारा दूध टिनो में भर कर
बेच रहे रख साईकिल पर
और गोपियाँ अपने घर में
खुश है अपने ट्रांजिस्टर में
सुनती हैं जब फ़िल्मी गाने
कौन सुने मुरली की ताने?
क्या बतलाऊ तुमको भैया
सूख गयी है जमुना मैया
घर घर में बाथरूम हो गए
चीर हरण के चांस खो गए
मैंने उन्हें टोक ही डाला
माफ़ करो नंदजी के लाला
आलोचक है निंदा करते
चीर हरण थे तुम क्यों करते?
कृष्ण कन्हैया बोले झट से
मै ना डरता आलोचक से
चीर हरण यदि मै ना करता
तो बतलाओ कैसे रखता
लाज द्रोपदी की दुनिया में
चीर बढाता भरी सभा में
मेरे पास स्टोक ना होता
तो बतलाओ फिर क्या होता?
चीर हरण कर कर मै लाया
मैंने था स्टोक बढाया
तो मौके पर काम आ गया
मेरा कितना नाम छा गया
वैसे कई चीज ऐसी है
जो अब भी पहले जैसी है
राजनीती का रंग वही है
उल्टा सीधा ढंग वही है
नेता चुन दिल्ली जाते है
लेकिन कभी नहीं आते है
लेने खबर क्षेत्र की अपने
जैसे कभी किया था हमने
गोकुल से चुन मथुरा आया
लेकिन कभी लौट ना पाया
इतना उलझ गया वैभव से
भेजा सन्देशा उद्धव से
पहले भी संयुक्त कई दल
कौरव जैसे बने बढा बल
पर पांडव से युद्ध कराया
ये है राजनीती की माया
अच्छा देर हुई बंधुवर
मुझको जाना है अपने घर
इतने में ही मुझे सुनाया
जागो,कितना दिन चढ़ आया
श्रीमती जी जगा रही थी
मेरा सपना भगा रही थी

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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