Archive for September, 2011

रात मै कैसे काटूं


रात मै कैसे काटूं
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तुम बिस्तर लेटे ही थे,नींद तुम्हे आ गयी
कितनी ही बातें करनी थी,कही और अनकही
रात मै कैसे काटूं
दर्द मै किससे बाटूँ
क्या बतलाऊं ,क्या क्या होता ,दिन भर मेरे संग
सास ससुर की सेवा और फिर बच्चे करते तंग
ननदें रहती नाक सिकोड़े,फरमाइश देवर की
कपडे,बर्तन,झाड़ू पोंछा,और सफाई घर की
तुम आते दफ्तर से थक कर,व्यस्त ,पस्त बेचारे
खाना खाते और सो जाते,झट से पाँव पसारे
दो मीठी बातें करने का,समय तुम्हे है नहीं
कितनी ही बातें करनी है,कही और अनकही
रात मै कैसे काटूं
दर्द मै किससे बाटूँ
शादी अपनी नयी नयी थी,वो क्या दिन होते थे
एक दूजे की बाहों में हम,जगते थे,सोते थे
बातें इतनी होती थी की जिनका अंत नहीं था
वैवाहिक जीवन का तो असली आनंद वही था
अब मन कुछ मांगे भी तो तुम,मुश्किल से जग पाते
बस अपना कर्तव्य निभा कर,फिर झट से सो जाते
सभी कामनायें दब कर के,मन में ही रह गयी
कितनी ही बातें करनी है,कही और अनकही
रात मै कैसे काटूं
दर्द मै किससे बाटूँ

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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महाभारत-आठ दोहे


महाभारत-आठ दोहे
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मै हूँ प्यासा युधिष्ठिर,तुम जल भरा तलाब
यक्ष प्रश्न का तुम्हारे,दूंगा सभी जबाब

तुम हो मछली घूमती,रहा तुम्हे मै ताक
प्रेम तीर एसा चले,कि बिंध जाए आँख

मुझ पर रीझी उर्वशी,मांगे प्रेम प्रसाद
श्राप मिले ,पर ना रमण,करूं और के साथ

कुरुक्षेत्र कि तरह है,घर,गृहस्थ,मैदान
तुम कहती सब से लड़ो,ये गीता का ज्ञान

इस विराट के महल में,सबके अपने कृत्य
अर्जुन जैसे योद्धा,सिखलाते हैं नृत्य

चक्रव्यूह तुमने रचा,पहन आवरण सात
सातों वाधाएं हटे, अभिमन्यु के हाथ

राह दिखाओ पति को,यदि पति है जन्मांध
गांधारी सी मत रहो,आँख पट्टियां बाँध

प्रेम गली सकड़ी नहीं,कृष्ण कहे मुसकाय
आठ लेन की सड़क है,आठ रानियाँ आय

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

हे अग्नि देवता!


हे अग्नि देवता!
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हे अग्नि देवता!
शारीर के पंचतत्वों में,
तुम विराजमान हो,
तुम्ही से जीवन है
तुम्हारी ही उर्जा से,
पकता और पचता भोजन है
तुम्हारा स्पर्श पाते ही,
रसासिक्त दीपक
ज्योतिर्मय हो जाते है,
दीपवाली छा जाती है
और,दूसरी ओर,
लकड़ी और उपलों का ढेर,
तुमको छूकर कर,
जल जाता है,
और होली मन जाती है
होली हो या दिवाली,
सब तुम्हारी ही पूजा करते है
पर तुम्हारी बुरी नज़र से डरते है
इसीलिए, मिलन की रात,
दीपक बुझा देते है
तुम्हारी एक चिंगारी ,
लकड़ी को कोयला,
और कोयले को राख बना देती है
पानी को भाप बना देती है
तुम्हारा सानिध्य,सूरत नहीं,
सीरत भी बदल देता है
तो फिर अचरज कैसा है
कि तुम्हारे आसपास,
लगाकर फेरे सात,
आदमी इतना बदल जाता है
कि माँ बाप को भूल जाता है
बस पत्नी के गुण गाता है
इस काया की नियति,
तुम्ही को अंतिम समर्पण है
हे अग्नि देवता! तुम्हे नमन है

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

आओ हम तुम जम कर जीमें


आओ हम तुम जम कर जीमें
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आओ हम तुम जम कर जीमें
तुम भी खाओ,हम भी खायें,बैठ एक पंक्ति में
आओ हम तुम जम कर जीमें
जनता के पैसे से चलता है ये सब भंडारा
रोज रोज ही भोग लगाता ,अपना कुनबा सारा
पत्तल पुरस,बैठ पंगत में,खायें,जो हो जी में
आओ हम तुम जम कर जीमें
जब तक बैठे हैं कुर्सी पर,जम कर मौज उड़ायें
देशी घी की बनी मिठाई, जा विदेश में खायें
अपने घर को जम कर भर लें,थोडा धीमे धीमे
आओ हम तुम जम कर जीमें
लेकिन बस उतना ही खायें,हो आसान पचाना
वर्ना जा तिहार का खाना,हमें पड़ेगा खाना
जाने कल फिर से हो,ना हो,पाँचों उंगली घी में
आओ हम तुम जम कर जीमें

मदन मोहन बहेती ‘घोटू’

मेरी परम प्रिया,जलेबी


मेरी परम प्रिया-जलेबी
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पीत वर्णा,
वक्र बदना
कमनीय काया धारिणी,
सुंदरी!
जैसे,अग्नि तपित स्निग्ध कुंड में,
स्नानोपरांत,
रस कुंड से रसरंजित हो,
उतर आई हो,
कोई महकती हुई परी
तुम्हे देख कर
मेरे अधर,
लालायित हो जाते हैं,
करने को तुम्हारा चुम्बन
तुम्हारे सामीप्य से,
एक तृष्णा सी जग जाती है,
और तुम्हे पाने को मचल जाता है मन
तुम्हारी मिठास
देती है एक अवर्णनीय ,
तृप्ति का आभास
स्वर्णिम आभा लिए,
तुम्हारी अष्टावक्र काया
मेरे मन को,
जितना आनंद से है भिगोती
उतना सुख तुम शायद ही दे पाती,
यदि तुम कनक छड़ी सी सीधी होती
मै मधुमेह पीड़ित,
मोहित रहता हूँ,
देख कर तुम्हारी मधुरता
सब कुछ बिसरा कर,
तुम्हारे रसपान का सुख,
भोगने से वंचित नहीं रह सकता
क्योंकि तुम मनभावन,हो ही ऐसी
मेरी परम प्रिया,जलेबी

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर


जय हनुमान ज्ञान गुण सागर
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हमारी स्वतंत्र भारत माता को,
सीता की तरह,
भ्रष्ट राजनीतिज्ञ रावणों ने,
कैद कर रखा रखा है,
हे हनुमान!
उनकी सोने की लंका को जलाओ,
और सीता को छुड़ाओ
मंहगाई सुरसा की तरह,
अपना मुंह फाड़ती ही जा रही है,
गरीब जनता,बत्तीस रूपये प्रति दिन में,
कैसे लघु रूप धारण कर,बाहर निकले,
हे हनुमान!इतना बतलादो
आम जनता,राम की सेना सी,
समुद्र के इस पार खड़ी है,
और दूसरी ओर,
सत्ताधारियों की सोने की लंका है ,
इस दूरी को पाटने के लिए,
एक सेतु का निर्माण जरूरी है,
पर एक दुसरे पर पत्थर फेंके जा रहे है,
हे हनुमान!राम का नाम लिखवा कर,
इन पत्थरों को तैरा दो
देश की व्यवस्थाएं
राम और लक्ष्मण जैसी,
भ्रष्टाचार के नागपाश में बंधी है,
हे बजरंगबली! अपने अन्ना जैसे,
गरुड़ मित्र को बुलवा कर,
नागपाश कटवा दो
गरीबी और भुखमरी के ,
ब्रह्मास्त्र की मार ने,
आम आदमी को,
लक्ष्मण जैसा मूर्छित कर रखा है,
हे पवन पुत्र!
स्वीजरलेंड में जमा,संजीवनी बूंटी लाओ ,
और सबको पुनर्जीवन दिलवा दो
सत्तारूढ़ दशानन का अहंकार,
दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है,
हे अन्जनिनंदन!
अब समय आ गया है,
रावन का दहन करा दो

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

आदमी को लचीला रहना चाहिए


आदमी को लचीला रहना चाहिए
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मैंने देखा,तूफानों में,
कुछ वृक्ष जो झुक जाते है
,बने रहते है
और कुछ तने,जो तने रहते है
जड़ से उखड जाते है
आदमी को परिस्तिथियों के,
हिसाब से चलना चाहिये
सख्त नहीं,लचीला रहना चाहिये
अब भगवान् को ही देखलो
परिस्तिथियों के अनुसार ,
कितने रूपों में अवतार लिये
जब प्रलय आया,और सृष्टि को,
बीज रूप से बचाना था,
मछली बन गये
मंदराचल का भार उठाना था
कछुआ बन गये
पृथ्वी को पानी से बाहर निकलना था,
वराह बन गये
उन्होंने बड़े बड़े काम ,छोटे बन कर,
कैसे किये जा सकते है,सिखलाया है
छोटे से वामन का अवतार लेकर,
तीन कदमो में,
तीन लोकों को,नाप कर बतलाया है
और अर्जुन के सारथी बन कर,
अपना विराट स्वरूप भी दिखलाया है
राम बन कर राजा के यहाँ जन्मे
और बारह वर्षों तक भटकते रहे वन में
और कृष्ण बने तो बचपन में ग्वालों के साथ,
चराई थी गायें
और बड़े होकर ,द्वारकाधीश भी कहलाये
जरासंध को सत्रह बार युद्ध में हराये
और परिस्तिथियों के हिसाब से ,
अठारवीं बार,युद्ध का मैदान छोड़ भागे,
और रणछोड़ कहलाये
हिरनकश्यप जैसी बुराइयों को मारने के लिये,
क्या क्या नहीं किया
आधे नर और आधे सिंह याने,
नरसिंह रूप में अवतार लिया
ये सब कथाएं,
हमें ये ही सिखाती है
आदमी को परिस्तिथियों के अनुसार चलना चाहिये,
जरूरत के मुताबिक़ ढलना चाहिये
सफलता पानी हो,तो लचीला रहना चाहिये

मदन मोहन बाहेती’घोटू’