अमरुद का पेड़
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एक छोटा पौधा रोंपा था,मैंने घर की बगिया में
मधुर फलों की आशा की थी,इस बेगानी दुनिया में
सींचा मैंने अति ममत्व से,बच्चों सा ,पोसा ,पाला
बड़े जतन से,सच्चे मन से,रोज रोज देखा,भाला
धीरे धीरे पौधा विकसा,उगी टहनियां,हुआ घना
उसने हाथ पैर फैलाये,आज गर्व से खड़ा,तना
चिकना तना,रजत सी आभा,भरा पूरा सा रूप खिला
लगे चहकने,पंछी ,तोते, एसा नया स्वरूप मिला
उसका कद,मेरे भी कद से,दूना,तिगुना बढ़ा हुआ
मैंने बोया था जो पौधा,आज वृक्ष बन खड़ा हुआ
पिछले बरस,एक टहनी पर,देखे, दो अमरुद लगे
मेरे नन्हे से बेटे के, जैसे थे दो दांत उगे
और इस साल,भरा है फल से,फल छोटे है,कच्चे है
एसा लगता टहनी पर चढ़,खेल रहे ,कुछ बच्चे है
पर नियति की नियत अजब है,उसने है दिल तोड़ दिया
फल पकने का मौसम आया,मैंने वो घर ,छोड़ दिया

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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