Archive for October, 2011

चंदा


चंदा
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किसी अच्छे कार्य के लिए,
या किसी आयोजन के लिए
किसी पूजा के लिए,
या किसी की सहायतार्थ,
जब कोई धनराशी,
विभिन्न लोगों से मांग मांग कर,
एकत्रित की जाती है,
उसे चन्दा कहते है
पर क्या आपने कभी ये सोचा है,
इसे चंदा ही क्यों कहते है?
सूरज ,सागर,सरिता या बादल क्यों नहीं कहते?
चन्दा,
सूरज से रौशनी उधर मांग,
दुनिया भर को शीतल उजाला देता है
और  इसी परोपकार में,लगा ही रहता है
इसी तरह ,लोगों से मांग मांग,जो राशी ,
परोपकार की आयोजन में लगाई जाती है ,
चन्दा कहलाती है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

मेडिकल कविता -हड्डियाँ और दांत


मेडिकल कविता
(हड्डियाँ और दांत )
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डाक्टर बताते है
बच्चा जब पैदा होता है,
उसके शारीर में 350  हड्डियाँ होती है,
पर जैसे जैसे उमर बढती है
हड्डियाँ जुडती है
आदमी में बदलाव आता है
हड्डिय मजबूत होती है,
और उनमे जुडाव आता है
हड्डियाँ और आदमी ,
दोनों हो जाते है सख्त
और बचपन की 350 हड्डियाँ,
बड़े होने पर,206 ही रह जाती है फ़क्त
और इसी तरह बचपन में,
आदमी के जबड़े में,
छुपे होते है बावन दांत
इनमे से बीस,जो हड़बड़ी में होते है,
जल्दी निकल जाते है
पर पांच सात बरस में टूट कर  गिर जाते है
ये दूध के दांत कहलाते है
पर बाकि के बत्तीस दांत,
जो धीरज रखते है
धीरे धीरे निकलते है
और पूरी उमर चलते है
हमारे शरीर के ये अंग,
हमें बहुत कुछ सिखाते है
हड्डियाँ जुडाव की ताकत बताती है,
और दांत धीरज की महत्ता बताते है

मदन मोहन बहेती ‘घोटू’

दीपोत्सव आये


दीपोत्सव आये

प्रमुदित मन हम करे दीप अभिनन्दन,

आज धरा पर कोटि चन्द्र मुस्काए

दीपोत्सव आये

बाल विधु से कोमल चंचल

सुंदर मनहर स्नेहिल निर्झेर

घर घर दीप जले

पल पल प्रीत पले

अंध तमस मय निशा आज मावस की

भूतल नीलाम्बर से होड़ लगाये

दीपोत्सव आये

रस मय बाती लों का अर्चन

पुलकित हे मन जन जन जीवन

नव प्रकाश आया

ले उल्हास आया

रससिक्त दीपक में लों मुस्काई

ज्यो पल्वल में पद्मावली छाये

दीपोत्सव आये

कोहरा छाने लगा है


कोहरा छाने लगा है
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चमकती उजली ऋतू का ,रूप धुंधलाने लगा है
कोहरा     छाने  लगा     है
बीच अवनी और अम्बर ,आ गया है  आवरण सा
गयी सूरज की प्रखरता,छा  गया कुछ चांदपन सा
मौन भीगे,तरु खड़े है,व्याप्त  मन में दुःख बहुत है
बहाते है,पात आंसू, रश्मियां उनसे विमुख है
कभी बहते थे उछालें मार कर, जब संग थे सब
हुए कण कण,नीर के कण,हवाओं में भटकते अब
कभी सहलाती बदन,वो हवाएं चुभने लगी  है
स्निग्ध थी तन की लुनाई,खुरदुरी होने लगी है
पंछियों की चहचाहट ,हो गयी अब गुमशुदा है
बड़ी बदली सी फिजा है,रंग मौसम का जुदा है
लुप्त तारे,हुए सारे,चाँद  शरमाने   लगा है
कोहरा  छाने लगा है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

कौन हो तुम, ये बताओ?


कौन हो तुम, ये बताओ?
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देख तुमको मै चमत्कृत
हुए दिल के तार  झंकृत
देख कर सौन्दर्य प्यारा
हुआ पागल दिल हमारा
रूप का हो तुम खजाना
ह्रदय चाहे तुम्हे पाना
चन्द्र सा मुख,तुम सजीली
तुम्हारी चितवन  नशीली
भंगिमायें मन लुभाती
तुम सुरा सी मद मदाती
मोहिनी सुन्दर बड़ी हो
स्वर्ण की जैसे छड़ी  हो
खोल सारे  द्वार मन के
तुम्हारे संग मधु मिलन के
सपन प्यारे सजाता मै
क्योंकि लगता विधाता ने
तुम्हे फुर्सत से गढ़ा है
निखर कर यौवन चढ़ा है
रूप सुन्दर परी सा धर
आयी अम्बर से उतर कर
और ना अब तुम सताओ
कौन हो तुम, ये बताओ?

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

लक्ष्मी माता और आज की राजनीति


 लक्ष्मी माता और आज की राजनीति
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जब भी मै देखता हूँ,
कमालासीन,चार हाथों वाली ,
लक्ष्मी माता का स्वरुप
मुझे नज़र आता है,
भारत की आज की राजनीति का,
साक्षात् रूप
उनके है चार हाथ
जैसे कोंग्रेस का हाथ,
लक्ष्मी जी के साथ
एक हाथ से ‘मनरेगा’जैसी ,
कई स्कीमो की तरह ,
रुपियों की बरसात कर रही है
और कितने ही भ्रष्ट नेताओं और,
अफसरों की थाली भर रही है
दूसरे हाथ में स्वर्ण कलश शोभित है
ऐसा लगता है जैसे,
स्विस  बेंक  में धन संचित है
पर एक बात आज के परिपेक्ष्य के प्रतिकूल है
की लक्ष्मी जी के बाकी दो हाथों में,
भारतीय जनता पार्टी का कमल का फूल है
और वो खुद कमल के फूल पर आसन लगाती है
और आस पास सूंड उठाये खड़े,
मायावती की बी. एस.  पी. के दो हाथी है
मुलायमसिंह की समाजवादी पार्टी की,
सायकिल के चक्र की तरह,
उनका आभा मंडल चमकता है
गठबंधन की राजनीती में कुछ भी हो सकता है
तृणमूल की पत्तियां ,फूलों के साथ,
देवी जी के चरणों में चढ़ी हुई है
एसा लगता है,
भारत की गठबंधन की राजनीति,
साक्षात खड़ी हुई है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

ऊष्मा


ऊष्मा
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माँ की गोद,पिता की बाहें,या पति पत्नी का आलिंगन
इनकी ऊष्मा सुखप्रदायिनी ,जिसमे भरा हुआ अपनापन
भुवन भास्कर,दिन भर तप कर,देता सबको ऊष्मा से भर
टिम टिम करता,दीपक जल कर,दे प्रकाश,लेता है तम हर
पंचतत्व में ,अगन तत्व है,जो देता इस तन को सुषमा
इससे ही जीवन चलता है ,जग में बहुत  जरूरी  ऊष्मा

मदन मोहन बाहेती’घोटू’