Archive for November, 2011

तो समझ लो आ गयी है सर्दियाँ


तो समझ लो आ गयी है सर्दियाँ
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बदन ठिठुराती हवा चलने लगे
और सूरज जल्द ही ढलने  लगे
छुओ पानी,तो बदन गलने  लगे
प्रियतमा की जुदाई  खलने लगे
वक़्त की रफ़्तार कुछ थमने लगे
तेल नारियल का अगर  जमने लगे
शाम होते धुंधलका छाने लगे
कोहरा भी कहर  बरपाने लगे
ठण्ड बाहर निकलना मुश्किल करे
रजाई में दुबकने को दिल करे
मन करे,लें जलेबी का जायका
साथ में हो गरम प्याला चाय का
गर्म तलते पकोड़े,ललचाये मन
गाजरों का गर्म हलवा खायें हम
शाल ,स्वेटर से सुनहरा तन ढके
धूप में तन सेकना अच्छा  लगे
तेल की मालिश कराओ  लेट कर
मुंगफलियाँ गरम खाओ, सेक कर
लगे जलने गर्म हीटर,सिगड़ीयां
तो समझ लो,आ गयी है सर्दियाँ

मदन मोहन बहेती’घोटू’

मै-घोटू


मै-घोटू
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घोटू हूँ,घोट मोट ,घोट घोट खूब पढ़ा ,
बड़ा हुआ,घाट घाट का पिया  पानी है
प्रेम किया घट घट से,गौरी के घूंघट से,
घूँट घूँट रस पीकर, काटी   जवानी है
घटी कई घटनायें,पर घुटने ना टेके,
कभी लाभ  कभी घाटा,ये ही जिंदगानी है
घाटा बढ़ा कद मेरा,घुटन ने भी आ घेरा,
घुट घुट कर जिंदगानी ,यूं ही  बितानी है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

विरोधाभास


विरोधाभास
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तैलीय पदार्थ,जैसे अखरोट,तिल,आदि,
और तले हुए नमकीन,
जब पुराने पड़ जाते है,
उन पर तेल चढ़ जाता है
उनका स्वाद बिगड़ जाता है
कोई नहीं खाता है
इसके विपरीत,
जब किसी की शादी होती है,
तो एसा रिवाज है,
कि शादी के पहले,
दूल्हा या दुल्हन पर तेल चढ़ाया जाता है
कहते है कि एसा करने पर,
उनके रूप में निखार आता है
पर ये विरोधाभास है,
जो मेरी समझ में नहीं आता है

घोटू

याद आती है हमें वो सर्दियाँ….


याद आती है हमें वो सर्दियाँ….
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गर्म गुड के गुलगुलों के दिन गये
बाजरे के  खीचडों  के  दिन गये
अब तो पिज़ा और नूडल चाहिये,
हाथ वाले  सिवैयों के   दिन गये
सर्दियों में आजकल हीटर जलें,
संग तपते अलावों के दिन गये
तीज और त्योंहार पर होटल चले,
पूरी  ,पुआ ,पुलाओं के  दिन गये
बिना चुपड़ी तवे की दो चपाती,
आलुओं के परांठों के दिन गये
गरम रस की खीर या फिर लापसी,
उँगलियों से चाटने के दिन गये
बैठ छत पर तेल की मालिश करे,
धूप में तन तापने के दिन गये
बढ न क्लोरोस्टाल जाये,डर कर इसलिए,
जलेबियाँ उड़ाने के दिन गये
गरम हलवा गाजरों का याद है,
रेवड़ियाँ चबाने के दिन गये
धूप  खाती थी पड़ोसन छतों पर,
उनसे नज़रें मिलाने के दिन गये
याद आती है हमें वो सर्दियाँ,
वो मज़ा अब उड़ाने के दिन गये

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

ग़ज़ल –तकियों के क्या करें दोस्ती……


         ग़ज़ल
तकियों के क्या करें दोस्ती…….
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तकियों से क्या करें दोस्ती,आये पास सुला देतें है
शीशे के प्याले अच्छे है,भर कर जाम,पिला देते है
बहुत मुश्किलें,जीवनपथ पर,पत्थर,कंकर है,कांटे है,
पर जूते है सच्चे साथी,रास्ता पार करा देते है
एक बार जो तप जाए तो,बहुत उबाल दूध में आता,
लेकिन चंद दही के कतरे,सारा दूध जमा देते है
अरे इश्क करने वालों का,ये तो है दस्तूर पुराना,
मालुम है कलाई थामेंगे,बस ऊँगली पकड़ा देते है
दो बुल (bull )अगर प्यार से मिलते,बन जाते नाज़ुक बुलबुल से,
चार प्यार के बोल तुम्हारे,पत्थर भी पिघला देते है
सुना केंकड़ों की बस्ती में,यदि कोई ऊपर उठता है,
कई केंकड़े टांग खींच कर,नीचे उसे गिरा देते है
मारो अगर  किसी हस्ती को,पब्लिक में जूता या थप्पड़,
ब्रेकिंग न्यूज़ ,मिडिया वाले,हीरो तुम्हे बना देते है
यही नियम होता प्रकृति का,कि चिड़िया के बच्चे बढ़  कर ,
उड़ना  सीख,अधिकतर देखा,अपना नीड़ बना लेते है
सुनते धरम,दान,पूजा से,अगला जनम सुधर जाएगा,
इस चक्कर में कई लोग ये,जीवन यूं ही गवां देते है
जीवन चुस्की एक बरफ की,समझदार कुछ खाने वाले,
चूस चूस कर,घूँट घूँट कर,इसका बड़ा मज़ा लेते है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

अनकही बातें–खर्राटे


अनकही बातें–खर्राटे
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रजनी की नीरवता में स्तब्ध मौन  सब
और नींद से बेसुध सी तुम, सोयी रहती  तब
तुम्हारे नथुनों से लय मय  तान निकलती
कैसे कह दूं कि तुम हो खर्राटे    भरती
दिल के कुछ अरमान पूर्ण जो ना हो पाते
वो रातों में है सपने बन कर के आते
उसी तरह  बातें जो दिन भर  ना कह पाती
तुम्हारे  खर्राटे बन कर  बाहर  आती
बातों का अम्बार दबा जो मन के अन्दर
मौका मिलते उमड़ उमड़ आता है बाहर
इतनी जल्दी जल्दी बाहर आती बातें
साफ़ सुनाई ना देती, लगती खर्राटे
दिन  की सारी घुटन निकल बाहर आती है
मन होता है शांत,नींद गहरी आती है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

छा रहा इस देश पर कोहरा घना है


दिख हर आदमी कुछ अनमना है
छा रहा इस देश पर कोहरा घना है
व्यवस्थाएं देश की बिगड़ी पड़ी है
जिधर देखो,गड़बड़ी ही गड़बड़ी है
लूट कर के देश नेता भर रहे घर
बेईमानी और रिश्वत को लगे  पर
कोष का हर द्वार चाटा  दीमकों ने
नींव कुरदी,देश की कुछ मूषकों ने
दीवारें इस दुर्ग की पोली पड़ी है
कभी भी गिर पड़ेगी,ऐसे  खड़ी है
लग गया घुन बेईमानी का सभी को
देश सारा खोखला सा है तभी तो
हो गए हालात कुछ ऐसे बदलते
रत्न गर्भा धरा से  पत्थर निकलते
स्वर्ण चिड़िया कहाता था देश मेरे
कर लिया है उल्लूओं ने अब बसेरा
ढक लिया है सूर्य को कुछ बादलों ने
बहुत दल दल दिया फैला कुछ दलों ने
समझ ना आये हुई क्या गड़बड़ी है
लहलहाती फसल थी,उजड़ी पड़ी है
परेशां हर आदमी आता नज़र है
हो रहे इलाज सारे बेअसर  है
पतंगों की तरह बढ़ते दाम हर दिन
और सांसत में फसी है जान हर दिन
हो रहे निर्लिप्त सब इस खेल में है
थे कभी राजा,गए अब जेल में है
दिख रहा ईमान अब दम तोड़ता है
साधने को स्वार्थ हर एक दोड़ता है
त्रसित हर जन,कुलबुलाहट हो रही है
क्रांति  की अब सुगबुगाहट  हो रही है
देश ऐसी स्तिथि में आ खड़ा है
धुवाँ सा है,आग पर पर्दा   पड़ा  है
और भीतर से सुलगता  हर जना है
छा रहा इस देश पर कोहरा  घना है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’