दफ्तरी लंच
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एक बड़े दफ्तर के आगे,
हम्मर एक खोखा है
जहाँ पर दफ्तरी लंच खाने का,
बड़ा अच्छा मौका है
जैसे घर का खाना खा कर,
आप फील करते है ‘होमली’
इसी तरह हमारे यहाँ खाकर,
आप फील करेंगे ‘दफ्तरी’
जैसे कागज़ की प्लेटें,लकड़ी के चमचे,
जो  काम निकलने के बाद,
फेंक दिए जाते है
जैसे चाटुकार चमचे,जो अपने ‘बॉस ‘को,
मक्खन लगाते है और  चाटते है पाँव
उनके लिए मिलते है,
मौजे और जूतों की बदबू रहित,पाव
और वो भी मख्खन लगे,फिर भी सस्ता भाव
चाटुकारों ने ,जब से हमारे पाव खाएं है
एसा टेस्ट बदला है,बार बार आये है
दूसरा आइटम ‘सेंडविच आम’ है
आम आदमी के लिए,
एक तरफ घर की समस्याओं की स्लाइस है,
और दूसरी तरफ दफ्तर की मुश्किलों की स्लाइस
बीच में ,थोड़ी सी मजबूरी का मख्खन,
टिमटिमाती आस का  टमाटर ,
पत्ते दर पत्ते मुसीबतों से आते हुए,
पत्ता गोभी के चंद कतरे
लोगों के उपहास की नमक मिर्च,
बस बन गयी सेंडविच
आम आदमियों सी कितनी आम साईं
फिर भी सस्ते दाम है
एक बाईट लेने पर लगता है,
सभी समस्याओं का हल हो गया है
मन को बहलाना कितना सरल हो गया है
तीसरा आइटम ‘ख्वाईशी दही बड़े ‘है
बड़े बनने की इच्छा में,
दलहन को दल कर दाल बनना पड़ता है
फिर रात भर पानी में गलना पड़ता है
बचपन के साथी छिलकों का साथ छोड़ ,
समय के सिल पर पिसना पड़ता है
फिर  दुनियादारी की कढ़ाही में,
उबलते हुए समझोतों के तेल में तले जाना होता है
तब कही जाकर,माखनी दही में,
डुबकी लगाने का आनंद मिलता है
इन दहिबडों को खाकर ही,
मन का कमल खिलता है
और भी कई आइटम है,
जो यदि आप खायेंगे,
दफ्तरी पायेंगे
जैसे गुलाब जामुन,
जिनमे  ना गुलाब की खुशबू है,
न जामुन का स्वाद,
फिर भी गुलाब जामुन कहाते है
बिलकुल आपके बॉस की तरह,
या आपके जॉब की तरह
जिनके नाम और काम में ,
आप बहुत बड़ा फर्क पाते है
सभी आइटमो का बेसिक सेलरी की तरह,
सस्ता दाम है
और मंहगाई भत्ते की तरह,
पानी पीने का मुफ्त इंतजाम है
क्योकि साहब,बेसिक सेलरी तो,
बेसिक मदों में ही चली जाती है
महीने खर्चा तो डी.ए.से चलता है
उसी तरह सेंडविच ,दहिबडों से,
भूख थोड़े ही मिटती है,
पेट तो पानी से ही भरता है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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