मै-घोटू
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घोटू हूँ,घोट मोट ,घोट घोट खूब पढ़ा ,
बड़ा हुआ,घाट घाट का पिया  पानी है
प्रेम किया घट घट से,गौरी के घूंघट से,
घूँट घूँट रस पीकर, काटी   जवानी है
घटी कई घटनायें,पर घुटने ना टेके,
कभी लाभ  कभी घाटा,ये ही जिंदगानी है
घाटा बढ़ा कद मेरा,घुटन ने भी आ घेरा,
घुट घुट कर जिंदगानी ,यूं ही  बितानी है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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