Archive for January, 2012

बूढों का हो कैसा बसंत?


बूढों का हो कैसा बसंत?
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पीला रंग सरसों फूल गयी
मधु देना अब ऋतू भूल गयी
सब इच्छाएं प्रतिकूल गयी
यौवन का जैसे हुआ अंत
बूढों का हो कैसा बसंत
गलबाहें क्या हो,झुकी कमर
चल चितवन, धुंधली हुई नज़र
क्या रस विलास अब गयी उमर
लग गया सभी पर प्रतिबन्ध
बूढों का हो कैसा बसंत
था चहक रहा जो भरा नीड़
संग छोड़ गए सब,बसी पीड़
धुंधली यादें,मन है अधीर
है सभी समस्यायें दुरंत
बूढों का हो कैसा बसंत
मन यौवन सा मदहोश नहीं
बिजली भर दे वो जोश नहीं
संयम है पर संतोष नहीं
मन है मलंग,तन हुआ संत
बूढों का हो कैसा बसंत

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

सोना बाथ और स्टीम बाथ


सोना बाथ और स्टीम बाथ
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सोनी,तेरी सुन्दरता ने,मुझको इतना उष्ण किया है
एसा लगता गरम कक्ष में,मैंने ‘सोना बाथ ‘लिया है
सर्दी में तेरे होठों ने,मुंह से ऐसी भाप निकाली,
मेरे अलसाये होठों को,जैसे ‘स्टीम बाथ’ दिया हो

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

उन्मुक्त विहंग


उन्मुक्त विहंग
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नहीं चाहता बंधू किसी प्रतिबन्ध में
नील गगन में उड़ता हुआ विहंग मै
साथ  पवन की लहरों के मै डोलता
सूरज की किरणों से हँसता,बोलता
बिना डोर के उडती हुई पतंग मै
नील गगन में उड़ता हुआ विहंग मै
पंख पसारे पंछी सा चहका चहका
खुशबू के झोकों जैसा महका महका
सागर के सीने में भरी तरंग मै
नील गगन में उड़ता हुआ विहंग मै
गौरी की आँखों  से बहते कजरे सा
मंडराता फूलों पर प्रेमी भँवरे  सा
होली की उडती गुलाल का रंग मै
नील गगन में उड़ता हुआ विहंग मै
सरिता की लहरों जैसा कल कल बहता
रंग  बिरंगी तितली सा उड़ता रहता
मतवाला,मनमौजी और मलंग मै
नील गगन में उड़ता हुआ विहंग मै

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

जलेबी-अतुकांत कविता


    जलेबी-अतुकांत कविता
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छंद, स्वच्छंद नहीं होते,
मात्राओं  के बंधन में बंधे हुए ,
तुक की तहजीब से मर्यादित
जैसे रस भरी बून्दियों की तरह,
शब्दों को बाँध कर,
मोतीचूर के लड्डू बनाये गये हो,
और लड्डुओं का गोल गोल होना ,
स्वाभाविक और पारंपरिक  है
पर जब शब्द,
अपने स्वाभाविक वेग से,
उन्मुक्त होकर,
ह्रदय से निकलते है,
तो जलेबी की तरह,
भावनाओं की कढ़ाई में तल कर,
प्रेम की चासनी में डूबे,
रससिक्त और स्वादिष्ट हो जाते है,
और उन पर ,
छंदों की तरह,
आकृति का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता,
और एक सा स्वाद होने के बावजूद भी,
हर जलेबी का,
अपना एक स्वतंत्र  मुखड़ा होता है,
आधुनिक,अतुकांत कविताओं की तरह

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

अहो रूप-महा ध्वनि


अहो रूप-महा ध्वनि
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इक दूजे की करे प्रशंसा,हम तुम ,आओ
मै तुम्हे सराहूं,  तुम मुझे  सराहो
ऊंटों की शादी में जैसे,आये गर्दभ,गायक बन कर
ऊँट सराहे गर्दभ गायन,गर्दभ कहे  ऊँट को सुन्दर
सुनकर तारीफ,दोनों प्रमुदित ,इक दूजे का मन बहलाओ
मै तुम्हे सराहूं,तुम मुझे सराहो
काग चोंच में जैसे रोटी, नीचे खड़ी लोमड़ी, तरसे
कहे  काग से गीत सुनाओ,अपने प्यारे मीठे स्वर से
तारीफ़ के चक्कर में अपने ,मुंह की रोटी नहीं गिराओ
मै तुम्हे सराहूं, तुम मुझे सराहो
इन झूंठी तारीफों से हम,कब तक खुद को खुश कर लेंगे
ना तो तुम ही सुधर पाओगे,और हम भी कैसे सुधरेंगे
इक दूजे की  कमी बता कर ,कोशिश कर ,सुधारो,सुधराओ
मै  तुम्हे सराहूं, तुम मुझे सराहो

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

मातृभूमि


मातृभूमि
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हे मातृभूमि तुझको प्रणाम
शत शत प्रणाम,शत शत प्रणाम
तेरी माटी में खेला मै
तेरी माटी  में मैला  मै
तेरी गोदी में बड़ा  हुआ
चलना सीखा और खड़ा हुआ
अ आ इ ई पढना सीखा
बाधाओं से लड़ना  सीखा

गिल्ली डंडा ,कंचे खेले

ये खेल बड़े थे अलबेले

लट्टू ,गेंदा,लंगड़ी घोड़ी

पेड़ों पर चढ़ ,जामुन तोड़ी

सीताफल खाये लगा पाल

दिनभर मस्ती,दिन भर धमाल

आगर की माटी लाल लाल
मेरा अबीर,मेरी गुलाल
मेरी प्रगति मेरा विकास
है सब इस माटी का प्रसाद
लेलो तुम चाहे कोई नाम
हम तो है वो ही घोटू राम
हे मातृभूमि तुझको प्रणाम
शत शत प्रणाम,शत शत प्रणाम

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

गुल से गुलकंद


गुल से गुलकंद
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पहले थी तुम कली
मन को लगती भली
खिल कर फूल बनी
तुम खुशबू से सनी
महकाया  जीवन
हर पल और हर क्षण
पखुडी पखुडी खुली
मन में मिश्री  घुली
गुल,गुलकंद हुआ
उर आनंद   हुआ
असर  उमर का पड़ा
दिन दिन प्यार बढ़ा
कली,फूल,गुलकंद
हरदम रही   पसंद
खुशबू प्यार भरी
उम्र यूं ही गुजरी

मदन मोहन बाहेती’घोटू’