चलो चल कर चाँद चूमे
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इस धरा पर क्या धरा है,चलो चल कर चाँद चूमे
गुरुत्व आकर्षण परिधि,लांघ कर हम व्योम घूमे
व्यर्थ रिश्तो ने निरर्थक ,बाँध कर हमको रखा है
इसलिए हमने अभी तक,चन्द्र का मधु ना चखा है
रूपसी के मृदुल मुख सा,चमकता है चाँद सुन्दर
रात की तनहाइयों में,मधु लुटाता है मधुकर
मधुर मधु का पान कर के ,मस्त हम मदहोश घूमे
इस धरा पर धरा क्या है,चलो चल कर चाँद घूमे
पास तारों को फटकने नहीं देता ,चाँद है  ये
बहुत गर्वीला स्वम पर,रूप का उन्माद है ये
क्षीण है,बलहीन होकर,अमावास को लुप्त होता
राक्षसी है,रात जगता,और दिन भर रहे सोता
क्या रखा है ,वहां जाने की तुम्हारी आरजू में
इस धरा पर क्या रखा है चलो चल कर चाँद चूमे
मर गयी संवेदनाये,ह्रदय क्यों कुंठित हुए  है
दूर की चमचमाहट को,देख आकर्षित हुए है
भूल करके मूल अपना चाँद को चाहने लगे है
पता भी है ,चाँद पर जा ,आदमी हल्का लगे है
स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर,छाताये है मातृभू में
इस धरा में बहुत कुछ है,व्यर्थ ही क्यों चाँद चूमे

मदन मोहन बाहेती;घोटू;

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