मै बसंती,तुम बसंती
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मौन मन ही मन मिलन की,कामनाये बलवती थी
तुम्हारा सानिध्य पाने की लगन मन में लगी थी
बात दिल की कह न पाया था तुम्हे संकोच वश मै
भावना के ज्वार के आगे हुआ था पर विवश  मै
और जब मदमस्त आया,फाग का मौसम सुहाना
देख पुष्पित वाटिका को ,भ्रमर था पागल,दीवाना
मदन उत्सव पर्व आया,रंग छलके होलिका के
देख कर यौवन प्रफुल्लित,हो गयी बेचैन आँखें
ऋतू बासंती सुहानी,और मौसम मदभरा सा
देख कर के रूप तुम्हारा हुआ मै बावरा  सा
ज़रा सी गुलाल लेकर ,गाल पर मैंने  लगा दी
हो गए शर्मो हया से,गाल तुम्हारे   गुलाबी
नज़र जब तुमने झुका ली,लगी मुझको बात बनती
हो गयी तुम भी बसंती,हो गया मै भी बसंती

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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