बसंत आ रही है
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पहले सुबह,
ओस की चादर से,
धीरे धीरे अपना मुख उघाडती थी
ठंडी,ठंडी,अलसाई सी,
देर से जागती  थी
अंगडाइयाँ  ले लेकर,
उबासियाँ  लिया करती थी
उठ कर सबसे पहले,
गरम चाय का प्याला पिया करती थी
पहले सबसे प्यारा,
रजाई और बिस्तर लगता था
सुबह सुबह,
ठंडा पानी छूने में भी  डर लगता था
पर आज सुबह,
उजली उजली सी,
नहा धोकर,
खुले खुले वस्त्र पहने,मुस्करा रही है
क्या बसंत ऋतू आ रही है

मदन मोहन बहेती’घोटू’

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