ऋतू परिवर्तन
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अब गया है बदल मौसम
तपन आई,गयी ठिठुरन
हुआ सत्ता परिवर्तन
कहीं खुशिया तो कहीं गम
जो नरम और गुदगुदी थी
प्यार ,उष्मा से लदी थी
कई रातें ,तन चड़ी जो
उपेक्षित सी ,अब पड़ी वो
हुई तनहा सी रजाई
ग्रीष्म की अब ऋतू आई
गर्म शालें और स्वेटर
गर्व से थे सजे तन पर
अब दुबक,सिमटे पड़े है
दुखी से लगते  बड़े है
देख कर के बदन सुन्दर
गर्म थे जो कभी गीजर
अब न विद्युत् तरंगे  है
स्नान घर में बस टंगे है
तेल नरियल का सुगन्धित
हुआ एसा शीत शापित
श्वेत हिम सा था गया जम
पर गया जब बदल मौसम
अब पिघलने लग गया है
पा पुनर्जीवन  गया है
और छत पर मौन लटके
हुए थे निर्जीव पंखे
पंख फैले,उड़ न  पाते
मगर अब है फरफराते
नाचते है संग हवा के
नया जीवन,पुनः पाके
रूपसियों का सुहाना
रूप का सुन्दर खजाना
हो कहीं गायब गया था
वसन से सब ढक गया था
ग्रीष्म ऋतु ने मगर आकर
कर दिया है सब उजागर
जल बहुत था दुखी ,बेकल
ठिठुरते थे,हाथ छूकर
आजकल इठला रहा है
सभी के मन भा रहा है
स्वेद बन गौरी बदन पर
बह रहा है,बड़ा  चंचल
कहीं खुशियाँ है कही गम
अब गया है बदल मौसम

मदन मोहन बहेती’घोटू’

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