प्रियतमा  तुम,सिर्फ हो तुम
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हूँ प्रफुल्लित,हुआ हर्षित,महक के उन्माद से मै
मन तरंगित ,नहीं बंधित,अब किसी भी बाँध से मै
मै समर्पित,तुम्हे अर्पित,अर्चना का  फूल प्यारा
तुम अविरल,बहो कल कल,सरिता तुम,मै किनारा
मै क्षुधा हूँ,तुम सुधा हो,मै पलक हूँ,आँख हो तुम
बिन तुम्हारे उड़ न पाता,पंछी हूँ मै,पांख  हो तुम
मै चमत्कृत,हुआ झकृत,तुम्हारा स्पर्श पाकर
लहर सा मन में बसा हूँ,प्यार का तुम हो समंदर
तुम्हारी धुन में मगन मै,ताल हो तुम,गीत हूँ  मै
मीत हो तुम,प्रीत हो तुम,प्रणय का संगीत हूँ मै
सूर्य की तुम रश्मि सी हो,मै अकिंचन चन्द्रमा हूँ
तुम्ही से उर्जा मिली है, तभी आलोकित बना हूँ
मै शिशिर सा,ग्रीष्म सा भी,तुम बसंती मस्त मौसम
पल्लवित,हर दम प्रफुल्लित,प्रियतमा तुम,सिर्फ हो तुम

मदन मोहन बहेती’घोटू’

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