Archive for April, 2012

लक्ष्मी जी का परिवार प्रेम


लक्ष्मी जी का परिवार प्रेम
(समुद्र मंथन से १४ रत्न प्रकट हुए थे-शंख,एरावत,उच्च्श्रेवा ,धवन्तरी,
कामधेनु,कल्प वृक्ष,इंद्र धनुष,हलाहल,अमृत,मणि,रम्भा,वारुणी,चन्द्र और लक्ष्मी
-तो लक्ष्मी जी के तेरह भाई बहन हुए,और समुद्र पिताजी-और क्योंकि
विष्णु जी समुद्र में वास करते है,अतः घर जमाई हुए ना )

एक दिन लक्ष्मी जी,अपने पति विष्णु जी के पैर दबा रही थी

और उनको अपने भाई बहनों की बड़ी याद आ रही थी

बोली इतने दिनों से ,घरजमाई की तरह,

रह रहे हो अपने ससुराल में

कभी खबर भी ली कि तुम्हारे तेरह,

साला साली है किस हाल में

प्रभु जी मुस्काए और बोले मेरी प्यारी कमले

मुझे सब कि खबर है,वे खुश है अच्छे भले

तेरह में से एक ‘अमृत ‘को तो मैंने दिया था बाँट

बाकी बचे चार बहने और भाई आठ

तो बहन ‘रम्भा’स्वर्ग में मस्त है

और दूसरी बहन ‘वारुणी’लोगों को कर रही मस्त है

‘मणि ‘बहन लोकर की शोभा बड़ा रही है

और ‘कामधेनु’जनता की तरह ,दुही जा रही है

तुम्हारा भाई ‘शंख’एक राजनेतिक पार्टी का प्रवक्ता है
और टी.वी.चेनल वालों को देख बजने लगता है
दूसरे भाई ‘एरावत’को ढूँढने में कोई दिक्कत नहीं होगी
यू.पी,चले जाना,वहां पार्कों में,हाथियों की भीड़ होगी
हाँ ,’उच्च्श्रेवा ‘भैया को थोडा मुश्किल है ढूंढ पाना
पर जहाँ अभी चुनाव हुए हो,ऐसे राज्य में चले जाना
जहाँ किसी भी पार्टी नहीं मिला हो स्पष्ट बहुमत
और सत्ता के लिए होती हो विधायकों की जरुरत
और तब जमकर ‘होर्स ट्रेडिंग’ होता हुए पायेंगे
उच्च श्रेणी के उच्च्श्रेवा वहीँ मिल जायेंगे
‘धन्वन्तरी जी ‘आजकल फार्मा कम्पनी चला रहे है
और मरदाना कमजोरी की दवा बना रहे है
बोलीवूड के किसी फंक्शन में आप जायेंगी
तो भैया’इंद्र धनुष ‘की छटा नज़र आ जाएगी
और ‘कल्प वृक्ष’भाई साहब का जो ढूंढना हो ठिकाना
तो किसी मंत्री जी के बंगले में चली जाना
और यदि लोकसभा का सत्र रहा हो चल
तो वहां,सत्ता और विपक्ष,
एक दूसरे पर उगलते मिलेंगे ‘हलाहल’
अपने इस भाई से मिल लेना वहीँ पर
और भाई ‘चंद्रमा ‘है शिवजी के मस्तक पर
और शिवजी कैलाश पर,बहुत है दूरी
पर वहां जाने के लिए,चाइना का वीसा है जरूरी
और चाइना वालों का भरोसा नहीं,
वीसा देंगे या ना देंगे
फिर भी चाहोगी,तो कोशिश करेंगे
तुम्हारे सब भाई बहन ठीक ठाक है,कहा ना
फिर भी तुम चाहो तो मिलने चले जाना

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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तेरे हाथों में


तेरे हाथों में

ये तेरा हाथ जिस दिन से,है आया मेरे हाथों में

जुलम मुझ पर ,शुरू से ही,है ढाया तेरे हाथों ने

तुम्हारे थे बड़े लम्बे,नुकीले ,तेज से नाख़ून,

दबाया हाथ तो नाखून,चुभाया तेरे हाथों ने

इशारों पर तुम्हारी उंगुलियों के ,रहा मै चलता,

बहुत ही नाच है मुझको, नचाया तेरे हाथों ने

हुई शादी तो अग्नि के,लगाए सात थे फेरे,

तभी से मुझको चक्कर में,फंसाया तेरे हाथों ने

कभी सहलाया है मुझको,नरम से तेरे हाथों ने,

निकाला अपना मतलब फिर,भगाया तेरे हाथों ने

शरारत हमने तुमने बहुत की है,मिल के हाथों से,

कभी सोते हुए मुझको जगाया तेरे हाथों ने

रह गया चाटता ही उंगुलियां मै अपने हाथों की,

पका जब प्रेम से खाना ,खिलाया तेरे हाथों ने

मै रोया जब,तो पोंछे थे,तेरे ही हाथ ने आंसू,

ख़ुशी में भी ,गले से था,लगाया तेरे हाथों ने

सफ़र जीवन का हँसते हंसते,कट गया यूं ही,

कि संग संग साथ जीवन भर,निभाया तेरे हाथों ने

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

खूब बूढों डोकरो होजे-आशीर्वाद या श्राप


खूब बूढों डोकरो होजे-आशीर्वाद या श्राप

पौराणिक कथाओं में पढ़ा था,
जब कोई बड़ा या महात्मा,
छोटे को आशीर्वाद देता था
तो "चिरंजीव भव"या "आयुष्मान भव "
या "जीवही शरदम शतः " कहता था
और मै जब अपनी दादी को धोक देता था
तो "खूब बूढों डोकरो होजे "की आशीष लेता था
और आज जब मेरे केश
सब हो गए है सफ़ेद
दांत चबा नहीं पा रहे है
घुटने डगमगा रहें है
बदन पर झुर्रियां छागयी है
काया में कमजोरी आ गयी है
क्षुधा हो गयी मंद है
मिठाई पर प्रतिबन्ध है
सांस फूल जाती है चलने में जरा
मतलब कि मै हो गया हूँ बूढा डोकरा
फलित हो गया है बढों का आशीर्वाद
पर कई बार मन में उठता है विवाद
एकल परिवार के इस युग में,
जब बदल गयी है जीवन कि सारी मान्यताएं
और ज्यादा लम्बी उमर पाना,
देता है कितनी यातनाएं
एक तो जर्जर तन
और उस पर टूटा हुआ मन
तो कौन चाहेगा,लम्बा हो जीवन
ज्यादा लम्बी उमर ,लगती है अभिशाप
और ये पुराने आशीर्वाद,
आज के युग में बन गए हैं श्राप

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

मन उड़न छू हो गया है


मन उड़न छू हो गया है

देख तुमको आज पहली बार कुछ यूं हो गया है
मन उड़न छू हो गया है
नीड़ में इतने दिनों तक,पड़ा था गुमसुम अकेला
बहुत व्याकुल हो रहा था, उड़न को वो पंख फैला
किन्तु अब तक उसे निज गंतव्य का था ना ठिकाना
देख तुमको बावरा सा, हो गया था वो दीवाना
फडफडा कर पंख भागा,रुका ना ,रोका घनेरा
और फुनगी पर तुम्हारे,ह्रदय की करके बसेरा
चहचहाने लग गया है,गजब जादू हो गया है
मन उड़न छू हो गया है
रहा है मिज़ाज इसका,शुरू से ही आशिकाना
देख कर खिलती कली को,मचलता आशिक दीवाना
कभी तितली की तरह से,डोलता था ये चमन में
गुनगुनाता भ्रमर जैसा,आस रस की लिए मन में
चाहता स्वच्छंद उड़ना,था पतंग सा आसमां में
पर अभी तक डोर उसकी,पकड़ कर थी,रखी थामे
उम्र के तूफ़ान में अब, मेरा काबू खो गया है
मन उड़न छू हो गया है

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

मजबूरी


मजबूरी
(घोटू के छक्के)

पत्नी से कहने लगे,घोटू कवि कर जोड़
आप हमी को डांटती,हैं क्यों सबको छोड़
हैं क्यों सबको छोड़,पलट कर पत्नी बोली
मै क्या करूं, तेज,तीखी है मेरी बोली
नौकर चाकर वाले घर में बड़ी हुई हूँ
बड़े नाज और नखरों से मै पली हुई हूँ

पत्नी जी कहने लगी,जा घोटू कवि पास
बतलाओ फिर निकालूँ,मन की कहाँ भड़ास
मन की कहाँ भड़ास,अगर डाटूं नौकर को
दो घंटे में छोड़,भाग जाएगा घर को
सुनू एक की चार,ननद से जो कुछ बोलूँ
तुम्ही बताओ ,बैठे ठाले,झगडा क्यों लूं

सास ससुर है सयाने,करते मुझसे प्यार
उनसे मै तीखा नहीं,कर सकती व्यवहार
करसकती व्यवहार,मम्मी बच्चों की होकर
अपने नन्हे मासूमों को डांटू क्यों कर
एक तुम्ही तो बचते हो जो सहते सबको
तुम्ही बताओ,तुम्हे छोड़ कर ,डाटूं किसको ?

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

हो गयी माँ डोकरी है


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हो गयी माँ डोकरी है

प्यार का सागर लबालब,अनुभव से वो भरी है
हो गयी माँ डोकरी है
नौ दशक निज जिंदगी के,कर लिए है पार उनने
सभी अपनों और परायों ,पर लुटाया प्यार उनने
सात थे हम बहन भाई,रखा माँ ने ख्याल सबका
रोजमर्रा जिंदगी के ,काम सब और ध्यान घर का
कभी दादी की बिमारी,पिताजी की व्यस्तायें
सभी कुछ माँ ने संभाला,बिना मुंह पर शिकन लाये
और जब त्योंहार आते,तीज,सावन के सिंझारे
सभी को मेहंदी लगाती,बनाती पकवान सारे
दिवाली पर काम करती,जोश दुगुना ,तन भरे वो
सफाई,घर की पुताई,मांडती थी,मांडने वो
और हम सब बहन भाई,पढाई में व्यस्त रहते
मगर सब का ख्याल रखती,भले थक कर पस्त रहते
गयी निज ससुराल बहने,भाइयों की नौकरी है
साथ बाबूजी नहीं है, हो गयी माँ डोकरी है
भूख भी कम हो गयी है,बिमारी है,क्षीण तन है
चाहती सब काम करना,मगर आ जाती थकन है
और जब त्योंहार आते,उन्हें आता जोश भर है
सभी रीती रिवाजों पर ,आज भी पूरा दखल है
ये करो, ऐसे करो मत,हमारी है रीत ऐसी
पारिवारिक रिवाजों को ,निभाने की प्रीत ऐसी
फोन करके,बहू बेटी को आशीषें बांटती है
कभी गीता भागवत सुन ,वक़्त अपना काटती है
भले ही धुंधलाई आँखें, मगर यादों से भरी है
हो गयी माँ डोकरी है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

छोटे बाल


छोटे बाल
(घोटू के छक्के)

तेल बचे,साबुन बचे,कंघी का नहीं काम
गीला सर झट पोंछ लो,सर्दी नहीं जुकाम
सर्दी नहीं जुकाम,जुंवें,फूसी,सब भागे
जल्दी सर न झुकाना पड़े,नाई के आगे
कह घोटू कविराय,बाल छोटे करवाये
खुला रहे सर,बात समझ में सब कुछ आये

हल्का हल्का सर लगे,कम हो सर पर भार
ना संवार ना सजावट,समय न हो बेकार
समय न हो बेकार,लगे मस्तक भी चोडा
नोच सके ना बाल,अगर झगडा हो थोडा
‘घोटू’ ने बालों को छोटा करवा डाला
झिझके मुंडा मुंडाया देख मूंडने वाला

मदन मोहन बाहेती’घोटू’