Archive for May, 2012

ये नींद उचट जब जाती है


ये नींद उचट जब जाती है
सर्दी की हो गर्मी की,
ये रातें बहुत सताती है
ये नींद उचट जब जाती है
मन के कोने में सिमटी सी
दुबकी,सुख दुःख से लिपटी सी
चुपके चुपके,हलके हलके
आ जाती खोल,द्वार दिल के
कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें
चुभने वाली कडवी यादें
कुछ अपनों की,बेगानों की
गुजरे दिन के अफ्सानो की
कुछ बीती हुई जवानी की
परियों की मधुर कहानी सी
कुछ कई पुराने बरसों की
कुछ ताज़ी कल या परसों की
कुछ हमें गुदगुदाती है आकर,
कुछ आंसू कई रुलाती है
ये नींद उचट जब जाती है
मन करवट करवट लेता है
तन करवट करवट लेता है
सुन तेरे साँसों की सरगम
छूकर रेशम सा तेरा तन
ये हाथ फिसलने लगते है
अरमान मचलने लगते है
आ जाते याद पुराने दिन
कटती थी रात नहीं तुम बिन
हम जगते थे,सो जाने को
हम थकते थे ,सो जाने को
मन अब भी करता है लेकिन
देता है टाल यूं ही ये तन
मन को मसोस कर रह जाते,
और हिम्मत ना हो पाती है
ये नींद उचट जब जाती है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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जमीन से जुड़ो


जमीन से जुड़ो

घास ,
जमीन से जुडी होती है
जो शबनम की बूंदों को भी,
बना देती मोती है
एक छोटा सा बीज,
जब धरती की कोख में समाता है
तो विशालकाय वृक्ष बन जाता है
या कई गुणित होकर,
फसल सा लहलहाता है
तारे,
जो ऊपर आसमान से ताल्लुक रखते है
लुप्त हो जाते है उजाले में,
बस रात को चमकते है
ये धरा क्या है
ये धरा हमारी माँ है
हमारी काया
को धरा की माटी ने बनाया
हमारा सहारा है,
हमारा आसरा है
आसमान में क्या धरा है
रत्नों की खान,रत्नगर्भा धरा है
इसलिए ज्यादा ऊंचे मत उड़ो
आसमान का तारा बनने से बेहतर है,
जमीन से जुड़ो

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

लालची लड़कियां


लालची लड़कियां

कुछ लड़कियां
रंगबिरंगी तितलियों सी मदमाती है
भीनी भीनी खुशबू से ललचाती है
उड़ उड़ कर पुष्पों पर मंडराती है
बार बार पुष्पों का रस पीती है
रस की लोभी है,मस्ती से जीती है
कुछ लड़कियां,
कल कल करती नदिया सी,
खारे से समंदर से भी,
मिलने को दौड़ी चली जाती है
क्योंकि समंदर,
तो है रत्नाकर,
उसके मंथन से,रतन जो पाती है
कुछ लड़कियां,
पानी की बूंदों सी,
काले काले बादल का संग छोड़,
इठलाती,नाचती है हवा में
धरती से मिलने का सुख पाने
और धरती की बाहों में जाती है समा
क्योंकि धरा,होती है रत्नगर्भा
ये लड़कियां,
खुशबू और रत्नों के सपने ही संजोती है
इतनी लालची क्यों होती है

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

आपकी खूबसूरती


आपकी खूबसूरती

आपको छूने से आ जाती जिस्म में गर्मी,
देख कर आँखों को ,ठंडक मिले गजब सी है
आपके पास में आने से पिघल जाता बदन,
आपके हुस्न की तासीर ही अजब सी है
आपके आते ही ,सारी फिजा बदल जाती,
आप मुस्काती हैं,तो जाता है बदल मौसम
एक खुशबू सी बिखर जाती है हवाओं में,
चहकने लगता है,महका हुआ सारा गुलशन
आप इतनी हसीं है और इतनी नाज़ुक है,
आपको छूने में भी थोडा हिचकता है दिल
आप में नूर खुदा का है,आब सूरज की,
चमक है चन्दा सी चेहरे पे,हुस्न है कातिल
बड़ी फुर्सत से गढ़ा है बनाने वाले ने,
उसमे कुछ ख़ास मसाला भी मिलाया होगा
देखता रह गया होगा वो फाड़ कर आँखें,
आपको रूबरू जब सामने पाया होगा

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

चलो आज कुछ तूफानी करते है


चलो आज कुछ तूफानी करते है
होटल में पैसे उड़ाते नहीं,
गरीबों का चायपानी करते है
चलो ,आज कुछ तूफानी करते है
अनपढ़ को पढना सिखायेंगे है हम
भूखों को खाना खिलाएंगे हम
काला ,पीला ठंडा पियेंगे नहीं,
प्यासों को पानी पिलायेंगे हम
काम किसी के तो आ जाएगी,
दान चीजें पुरानी करतें है
चलो,आज कुछ तूफानी करते है
निर्धन की बेटी की शादी कराये
अंधों की आँखों पे चश्मा चढ़ाएं
अपंगों को चलने के लायक बनाये
पैसे नहीं,पुण्य ,थोडा कमाए
अँधेरी कुटिया में दीपक जला,
उनकी दुनिया सुहानी करते है
चलो ,आज कुछ तूफानी करते है
बूढों,बुजुर्गों को सन्मान दें
बुढ़ापे में उनका सहारा बनें
बच्चों का बचपन नहीं छिन सके
हर घर में आशा की ज्योति जगे
लाचार ,बीमार ,इंसानों के,
जीवन में हम रंग भरते है
चलो,आज कुछ तूफानी करते है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

अपना अपना नजरिया


अपना अपना नजरिया
एक बच्चा कर में जा रहा था
एक बच्चा साईकिल चला रहा था
साईकिल वाले बच्चे ने सोचा,
देखो इसका कितना मज़ा है
कितना सजा धजा है
न धूल है,न गर्मी का डर है
नहीं मारने पड़ते पैडल है
क्या आराम से जी रहा है
कार वाले लड़के ने सोचा,
मै कार के अन्दर हूँ बंद
मगर इस पर नहीं कोई प्रतिबन्ध
जिधर चाहता है ,उधर जाता है
अपने रास्ते खुद बनाता है
कितने मज़े से जी रहा है
दोनों की भावनायें जान,
ऊपरवाला मुस्कराता है
कोई भी अपने हाल से संतुष्ट नहीं है,
दूसरों की थाली में,
ज्यादा ही घी नज़र आता है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

विसंगति


विसंगति

एक बच्ची के कन्धों पर,
स्कूल के कंधे का बोझ है
एक बच्ची घर के लिए,
पानी भर कर लाती रोज है
एक को ब्रेड,बटर,जाम,
खाने में भी है नखरे
एक को मुश्किल से मिलते है,
बासी रोटी के टुकड़े
एक को गरम कोट पहन कर
भी सर्दी लगती है
एक अपनी फटी हुई फ्राक में
भी ठिठुरती है
एक के बाल सजे,संवरे,
चमकीले चिकने है
एक के केश सूखे,बिखरे,
घोंसले से बने है
एक के चेहरे पर गरूर है,
एक में भोलापन है
इसका भी बचपन है,
उसका भी बचपन है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’