पानी-तीन कवितायें


पानी का संगीत

पानी का एक अपना संगीत होता है

आसमान से बरसता है,तो रिमझिम करता है

नदिया में बहता है तो कलकल करता है

झरनों से झरता है तो झर झर करता है

सागर की लहरों में,सर सर उछलता है

वैसे तो शांतिप्रिय है,पर जब उफान पर आता है

तो तांडव नृत्य करता हुआ,

बाढ़,तूफ़ान और सुनामी लाता है


पानी का स्वभाव

पानी जब जमीन पर रहता है

कल कल कर बहता है,

मधुर मधुर संगीत देता है

और जब थोडा ऊपर उठता है

श्वेत रजत सा बर्फ बना,

पहाड़ों पर चमकता है

और जब और भी ज्यादा ,

ऊँचा उठ जाता है

उसमे गरूर आ जाता,

काले काले बादल सा बन जाता है

कभी बिजली सा कड़कता है

कभी जोरों से गरजता है

कभी तरसाता है,कभी बरसता है

उसका रंग,रूप और स्वभाव,
ऊंचाई के साथ साथ,बदलता रहता है
पानी का और मानव का स्वभाव,
कितना मिलता जुलता है
क्योंकि मानव के शरीर में,
70 % से भी अधिक,पानी रहता है

पानी और संगत का असर
धरा के संपर्क में पानी,
कल कल करता रहता है
मानव के संपर्क में आ वो पानी,
मल मूत्र बन बहता है
समुन्दर के संपर्क में आकर,
खारा हो जाता है
सूरज के संपर्क में आकर,
बादल बन जाता है
साथ मिला गर्मी का,
वाष्प है बन जाता
और मिली सर्दी तो,
बर्फ बन जम जाता

पानी वही पर जैसी होती है,
उसकी संगत या साथ
बदल जाता है उसका रंग रूप,
रहन सहन और स्वाद

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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