अंग्रेजी का भूत

हमारी एक पड़ोसन,
एकदम देशी अंग्रेजन
वैसे तो फूहड़ लगती थी
पर अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करने में,
अपनी शान समझती थी
हिंदी से परहेज था,
उनके घर का हर सदस्य,
पूरा अंग्रेज था
एक दिन हम उनके घर गये,
करने मुलाक़ात
हो रही थी इधर उधर की बात
इतने में ही उनका बच्चा बोला,
मम्मी,बाथरूम आ रहा है
हमने इधर उधर देखा और बोले,
हमें तो कहीं भी बाथरूम,
आता नज़र नहीं आरहा है
क्या आजकल मोबाईल बाथरूम भी आता है
जो ड्राइंग रूम में भी चला आता है
मेडम बोली,भाई साहब,
बच्चे को बाथरूम जाना है
हम बोले इसी सर्दी में,
क्या रात को नहाना है
वोबोली,नहीं,नहीं,बच्चे को सु सु आ रही है
बच्चा बोला,मम्मी ,आ नहीं रही,आ गयी है
मेडम ,गुस्से में लाल पीली थी
हमने देखा,बच्चे की चड्ढी गीली थी
एक दिन वो अपने पति के साथ,
हमारे घर आई
हमारी पत्नीजी ने गरम गरम पकोड़ी बनायी
उनके पतीजी ने फटाफट पांच छह पकोड़ी खाली
तभी बोली उनकी घरवाली
अरे आज तो आपका मंगल का फास्ट था
तो पति बोले,ओह’ शिट ‘मैंने तो खा ली
हमने बजायी ताली
और बोले भी साहेब,आपने ‘शिट ‘नहीं,
पकोड़ी है खाई
हमारी बात सुन वो सकपकाई
बोली भाई साहेब,’ओह शिट’ इनका तकिया कलाम है
अंग्रेजी उपन्यासों में ये बड़ा आम है
एक दिन उनके पतीजी थे घर पर
हमारी पत्नी ने पूंछ लिया ,
क्या भाई साहेब की तबियत ठीक नहीं है,
जो वो नहीं गये है दफ्तर
पड़ोसन बोली वैसे तो तबियत ठीक है,
हो रहे हैं पर ‘मोशन’
हमारी पत्नी ने कहा ‘कानग्रेचुलेशन’
कब दे रही हो प्रमोशन की पार्टी
वो झल्लाई काहे की पार्टी
उन्हें सुबह से ‘लूज मोशन ‘हो रहे है,
वो पस्त है
पत्नी बोली सीधे सीधे बोलो ना,
लग गये दस्त है
इन कई वारदातों के बाद,
आजकल हमसे वो,
संभल कर जुबान खोलती है
जब भी बोलती है,हिंदी में बोलती है

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

Advertisements