कागा-बढ़भागा

कौवा ,एक बुद्धिमान प्राणी है

बात ये जानी मानी है

हम सबने उस कौवे की कथा तो है पढ़ी

जिसको लग रही थी प्यास बड़ी

उसे एक छत पर

एक मटकी आई नज़र

जिसकी तली में थोडा पानी था

पर कौवा तो ज्ञानी था

वो चुन चुन कर,लाया कंकर

और मटकी में डालता गया,

और जब पानी का स्तर

उसकी चोंच की पहुँच तक आया

उसने अपनी प्यास को बुझाया

प्राचीन ग्रंथो में भी,

काग के गुण गाये जाते है

काग जैसी चेष्ठा को,विद्यार्थी के,

पांच लक्षणों में से एक बताते है

कहते है कौवा एकाक्षी होता है
सबको एक नज़र से देखने वाला पक्षी होता है
कोयल ओर कागा,दोनों हमजाति है
फर्क केवल इतना है,
कौवा कांव कांव करता है
और कोयल कूहू कूहू गाती है
पर कौवा परोपकारी जीव है,
जाति धर्म निभाना जानता है
कोयल के अण्डों को अपना मान कर पालता है
कौवा प्रतीक है,हमारे पुरखों का
और ये चलन है कई बरसों का
कि जब हम श्राद्ध पक्ष मनाते है,
तो सबसे पहले कौवे को खाना खिलाते है
एक पुराना मुहावरा है,
‘कौवा चला हंस कि चाल’
पर आजकल है उल्टा हाल,
हंस जैसे सफेदपोश नेता,
कौवे कि चाल चलते है
काजल कि कोठरी से भी,
बिना दाग निकलते है
कोयले कि दलाली में कमाया हुआ काला धन ,
स्विसबेंकों में जमा करते है
कौवे की कांव कांव,आजकल,
बड़ी पोपुलर दिखाई देती है
विधानसभा हो या संसद,
हड़ताल हो या बंद,
हर जगह बस कांव कांव ही सुनाई देती है
पुराने जमाने में,जब ,मोबाईल नहीं होता था,
विरहन नायिकाएं,बस कौवे के गुण गाती थी
अटरिया पर कौवे की कांव कांव,
उन्हें पियाजी का संदेशा सुनाती थी
और जब पिया के आने का सन्देश मिलता था,
उसकी चोंच को सोने से मढ़ाती थी
ये काग का ही सामर्थ्य था,
कि वो कृष्ण कन्हैया के हाथों से,
माखन रोटी छीन सकता था
सीता माता के चरणों में चोंच मार सकता था
वो काकभुशंडी कि तरह,भक्त और विद्वान् है
कौवा सचमुच महान है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

Advertisements