कभी सोलह की लगती हो, कभी सत्रह की लगती हो

मुझे जब कनखियों से देखती ,तिरछी नज़र से तुम

बड़ी हलचल मचा देती हो मेरे इस जिगर में तुम

दिखा कर दांत सोने का, कभी जब मुस्कराती हो

तो इस दिल पर अभी भी सेकड़ों ,बिजली गिराती हो

हुआ है आरथेराइटिस, तुम्हे तकलीफ घुटने की

मगर है चाल में अब भी ,अदायें वो, ठुमकने की

वही है शोखियाँ तुम में,वही लज्जत, दीवानापन

नजाकत भी वही,थोडा,भले ही ढल गया है तन

बदन अब भी मुलायम पर,मलाईदार लगती हो

महकती हो तो तुम अब भी,गुले गुलजार लगती हो

तुम्हारा संग अब भी रंग ,भर देता है जीवन में

जवानी जोश फिर से लौटता है तन के आँगन में

सवेरे उठ के जब तुम ,कसमसा ,अंगडाई भरती हो

कभी सोलह की लगती हो,कभी सत्रह की लगती हो

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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