लहत तट संवाद -2
ज्वार -भाटा
तुम निर्जीव समुन्दर तट हो ,
और लहर हूँ ,मै मदमाती
मै ही हरदम,आगे बढ़ कर ,
मधुर मिलन को,तुमसे आती
कुछ पल लेते ,बाहुपाश में,
पी रस मेरा , मुझे छोड़ते
सचमुच तुम कितने निष्ठुर हो,
मेरा दिल ,हर बार तोड़ते
मै ही सदा ,पहल करती हूँ,
कभी न बढ़ तुम आगे आये
पहल न करते ,बैठे रहते ,
आस मिलन की ,सदा लगाये
तट मुस्काया,हंस कर बोला ,
ना ना ऐसी बात नहीं है
चाव मिलन का ,जितना तुम में,
मेरे मन में , चाव वही है
उठता ‘ज्वार’ तुम्हारे दिल में,
तो तुममे उफान आ जाता
और जब आता है ‘भाटा ‘तो ,
मै नजदीक तुम्हारे आता

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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