वरिष्ठ नागरिक संगठन

मिल के सब बूढ़े इकट्ठे हो गये
इस बहाने हंसी ठट्ठे हो गये
ढलते सूरज में चमक सी आ गयी ,
दांत तन्हाई के खट्टे हो गये
याद कर बीती जवानी की उमर ,
सब के सब फिर जवां पट्ठे हो गये
दूसरों की सुनी ,अपनी भी कही ,
रोज के सब दूर रट्टे हो गये
एक से दुःख,दिक्कतें ,गम,एक ही ,
थैली के सब ,चट्टे बट्टे हो गये
लगे जब से खाने है ताज़ी हवा ,
देख लो ,सब हट्टे कट्टे हो गये
दही थे,मख्खन जवानी में गया ,
अब तो सेहतमंद मठ्ठे हो गये
खाने थे जो जवानी में खा लिये ,
‘घोटू ‘अब अंगूर खट्टे हो गये

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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