अब बुढ़ापा आ गया है

फुदकती थी,चहकती थी ,गौरैया सी जो जवानी ,
आजकल वो धीरे धीरे ,लुप्त सी होने लगी है
प्रभाकर से, प्रखर होकर,चमकते थे ,तेजमय थे ,
आई संध्या ,इस तरह से ,चमक अब खोने लगी है
‘पियू ‘ पियू’कह मचलता था पपीहा देख पावस ,
इस तरह हो गया बेबस ,उड़ भी अब पाता नहीं है
भ्रमर मन,रस का पिपासु ,इस तरह बन गया साधु ,
देखता खिलती कली को,मगर मंडराता नहीं है
इस तरह हालात क्यों है ,शिथिल सा ये गात क्यों है ,
चाहता मन ,कर न पाता ,हुई इसी बात क्या है
देख कर यह परिवर्तन,बड़ा ही बेचैन था मन,
समय ने हँस कर बताया ,अब बुढ़ापा आ गया है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

Advertisements