निद्रा के पंचांग

तन्द्रा
एक तरफ दिल ये कहता है,सोना बहुत जरूरी
लेकिन एक तरफ होती है ,जगने की मजबूरी
जागे भी हम,ऊंघें भी हम,झपकी भी है आती
ऐसी हालत जब होती है ,तन्द्रा है कहलाती

करवट
कभी सोचते है ,इधर आयेगी वो
कभी सोचते है ,उधर आयेगी वो
इधर ढूंढते है,उधर ढूंढते है
हम नींद को हर तरफ ढूंढते है
इन्ही उलझनों में पड़े जब भटकना
इसको ही कहते है ,करवट बदलना

खर्राटे
मन में जो भी दबी हुई , रहती है बातें
कुछ मजबूरी वश जिनको हम कह ना पाते
जल्दी जल्दी बाहर निकले ,जब सो जाते
समझ में नहीं आते ,बन जाते है खर्राटे

सपने
मन के अन्दर की दबी हुई भावनायें
या किस्से ,अनसुने ,अनकहे ,अनचाहे
छिपा हुआ डर और अनसुलझी समस्यायें
अधूरे अरमान ,सब,सपने बन कर आये

नींद
न इधर की खबर है
न उधर की खबर है
पड़ी शांत काया ,
बड़ी बेखबर है
दबी बंद आँखों में ,
सपने है रहते
रहे शांत तन मन ,
उसे नींद कहते

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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