Archive for May, 2013

आज का मौसम


आज का मौसम
आज ठंडी सी हवाएं चल रही है ,
ऐसा लगता है कहीं बरसात आई
मेरे दिल को बड़ी ठडक मिल गयी है ,
देख मुख पर तुम्हारे मुस्कान छाई
कल तलक तो थी तपिश,मौसम गरम था ,
और थपेड़े गरम लू के चल रहे थे
आपकी नाराजगी से दिल दुखी था ,
और विरह की आग में हम जल रहे थे
बहुत तडफा मन,तुम्हारी याद में था ,
आँख कितनी बार मेरी डबडबाई
आज ठंडी सी हवाएं चल रही है,
एसा लगता है कहीं बरसात आई
आपका भी हाल होगा हमारे सा,
आपको भी याद मेरी आई होगी
घिरे होंगे याद के बादल घनेरे ,
भावनाएं घुमड़ कर मंडराई होगी
चाह तुममे भी हमारी जगी होगी,
मिलन को बैचैन हो तुम कसमसाई
आज ठंडी सी हवाएं चल रही है ,
ऐसा लगता है कहीं बरसात आई

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

mazza


मज़ा घास हो जो हरी कोमल,घूमने में है मज़ा
गुलाबी हो गाल या लब ,चूमने ने है मज़ा
फलों वाली डाल हो तो , लूमने में है मज़ा
और नशा हो प्यार का तो,झूमने में है मज़ा

घोटू

तुम्हे रात भर नींद न आती


दिन में क्यों इतना सो जाती
तुम्हे रात भर नींद आती
बार बार करवट लेती हो,
और जगा मुझको देती हो
मै सारा दिन मेहनत करता,
आफिस में हूँ ,खटपट करता
थका हुआ जब घर पर आता
खाना खाता ,और सो जाता
तुम टी,वी,के सभी सीरियल
देखा करती ,देर रात तक
मै गहरी निद्रा में सोता
लेकिन अक्सर ऐसा होता
मुझे नींद से उठा,जगा कर
तुम पूछा करती ,अलसाकर
अजी ,सो रहे हो क्या,जागो
क्या टाइम है,ये बतला दो
और मुझको लिपटा लेती हो
मेरी नींद उड़ा देती हो
कभी कभी ,दिन में ना सोती
तो भी मेरी मुश्किल होती
इतने भरती हो खर्राटे
कि हम मुश्किल से सो पाते
ये तुम्हारा खेल पुराना
जैसे भी हो ,मुझे जगाना
और सताती रहती ,जब तब
सीख कहाँ से आई ,ये सब
मुझ पर ढेरो प्यार लुटाती
जगा जगा कर हो तडफाती
दिन में क्यों इतना सो जाती
तुम्हे रात भर,नींद न आती

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

थका हुआ घोड़ा


थका हुआ घोड़ा

जीवन के कितने ही दुर्गम ,पथ पर सरपट ,भागा दोड़ा

मै तो थका हुआ हूँ घोड़ा
मै हूँ अश्व रवि के रथ का ,करता हूँ ,दिन रात नियंत्रित
सेवा और परोपकार में, मेरा सारा जीवन अर्पित
कभी ,किसी तांगे में जुत कर ,लोगों को मंजिल दिलवाई
कभी किसी दूल्हे को अपनी ,पीठ बिठा ,शादी करवाई
कितने वीर सैनिको ने थी ,करी सवारी,मुझ पर ,रण में
‘ पोलो’और खेल कितने ही ,खेले मैंने ,क्रीडांगन में
राजा और शूरवीरों का ,रहा हमेशा ,प्रिय साथी बन
उनके रथ को दौडाता था,मै ही था द्रुतगामी वाहन
झाँसीवाली रानी के संग ,अंग्रेजों से युद्ध किया था
अमर सिंह राठौर सरीखे,वीरों के संग ,मरा,जिया था
महाराणा प्रताप से योद्धा ,बैठे थे मेरी काठी में
मेरी टापों के स्वर अब भी ,गूँज रहे हल्दी घाटी में
दिया कृष्ण ने अर्जुन को जब,गीता ज्ञान,महाभारत में
ज्ञान सुधा मैंने भी पी थी ,मै था जुता हुआ उस रथ में
प्रकटा था समुद्र मंथन में ,लक्ष्मीजी का मै भाई हूँ
मै शक्ती का मापदंड हूँ , अश्व -शक्ती की मै इकाई हूँ
हुआ अशक्त मशीनी युग में ,लोगों ने मेरा संग छोड़ा
मै तो थका हुआ हूँ घोडा

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

दान की महिमा


दान की महिमा बड़ी महान
रतन जवाहर उगले धरती ,खोदो अगर खदान
और खेत का सीना चीरो, तो उपजे धन धान
सच्चे मन से प्रभु को सुमरो ,मिलता है वरदान
जीवन सारा है साँसों का बस आदान ,प्रदान
मेरे सास ससुर ने मुझको ,दे निज कन्या दान
बिन घर, बना दिया घरवाला ,किया बहुत अहसान
पांच साल में नेता चुनती जनता, कर मतदान
जीत चुनाव,करे जनता पर ,ढेरों टेक्स लदान
बेईमानी,लूटमार का ,है क्या कोई निदान
बड़े गर्व से पर हम कहते ,मेरा देश महान

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

अपच


गेंहू ,चना ,चावल या और भी कोई अन्न,
ऐसे ही नहीं खाया जाता ,
पहले उसको दला ,पीसा,
भूना या उबाला जाता है
तब कहीं खाने के योग्य,
और सुपाच्य बनता है
हमारे समझदार नेता ,
खाने पीने वाले होते है ,
और अन्न ,भोलीभाली जनता है
वो पहले जनता को दुखों से दलते है,
परेशानियों से पीसते है,
मंहगाई से भूनते है
गुस्से से उबालते है
और उसकी मेहनत का करोड़ों रुपिया ,
बड़े प्रेम से डकारते है
कुछ जो ज्यादा जल्दी में होते है ,
कभी कभी कच्चा अन्न ही खा जाते है
और उनकी समझ में ये बात नहीं आती है
कि ज्यादा और जल्दी जल्दी खाने से,
अपच हो जाती है

मदन मोहन बाहेती’ घोटू’

क्यों?


क्यों?

तुम भगवान् को मानते हो,
जो एक अनुपम अगोचर शक्ती है ,
जिसने इस संसार का निर्माण किया है
तुम साधू,संत और गुरुओं को पूजते हो,
क्योंकि उन्होंने तुम्हे ज्ञान का प्रकाश दिया है
तुम अपनी पत्नी के गुण गाते हो,
क्योंकि उसने तुम्हारी जिन्दगी को,
प्यार के रंगों से सजाया है
तो फिर तुम अपने उन माँ बाप का,
तिरस्कार क्यों करते हो ,
जिन्होने तुम्हारा निर्माण किया,
तुम्हे ज्ञान दिया,और तुम पर,
जी भर भर के प्यार लुटाया है?

मदन मोहन बाहेती’घोटू’