भ्रष्टाचारी,बेईमानी ,
देखो जिधर उधर गड़बड़ है
इस हमाम में सब नंगे है ,
सब ही इक दूजे से बढ़ है
कोई किस पर करे भरोसा
सभी तरफ धोखा ही धोखा
पड़े हुए आदश फर्श पर,
और सफ़ेद अब रक्त हो गया
राजनीति से घिन आती है ,
ये मन इतना दग्ध हो गया
चोरबाजारी ,घूस,रिश्वते ,
घोटाले और हेरा फेरी
लूट खसोट कर रहे सब ही ,
आधी तेरी,आधी मेरी
राजनीति के इस अड्डे में
गिरे पतन के सब गड्डे में
बहुत जरूरी ,जैसे तैसे,
इन्हें बचाना तख़्त हो गया
राजनीती से घिन आती है ,
ये मन इतना दग्ध हो गया
रोज़ रोज़ हो रहे उजागर ,
नए नए सकें ,घोटाले
सभी कोयले के दलाल है ,
हाथ सभी के काले ,काले
इक दूजे को लगे बचाने
भूल गए आदर्श पुराने
सत्ता की लिप्सा के सुख में,
मन इतना अनुरक्त हो गया
राजनीति से घिन आती है ,
ये मन इतना दग्ध हो गया

मदन मोहन बाहेती’घोटू ‘

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