ग्रीष्म

ये धरती जल रही है
गरम लू चल रही है
सूर्य भी जोश में है
बड़े आक्रोश में है
गयी तज शीत रानी
उषा ,ना हाथ आनी
और है दूर संध्या
बिचारा करे भी क्या
उसे ये खल रहा है
इसलिए जल रहा है
धूप में तुम न जाना
तुम्हारा तन सुहाना
देख सूरज जलेगा
मुंह काला करेगा
बचाना धूप से तन
ग्रीष्म का गर्म मौसम
भूख भी है रही घट
मोटापा भी रहा छट
न सोना बाथ जाना
न जिम में तन खपाना
पसीना यूं ही बहता
निखरता रूप रहता
प्राकृतिक ये चिकित्सा
निखारे रूप सबका
ये सोना तप रहा है
क्षार सब हट रहा है
निखर कर पूर्ण कुंदन
चमकता तुम्हारा तन
लगो तुम बड़ी सुन्दर
बदन करती उजागर
तुम्हे सुन्दर बनाती
ग्रीष्म हमको सुहाती

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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