जीवन चक्र

बचपन
निश्छल मन
सबका दुलार, अपनापन
जवानी
बड़ी दीवानी
कभी आग कभी पानी
रूप
अनूप
जवानी की खिली धूप
चाह
अथाह
प्यार ,फिर विवाह
मस्ती
दिन दस की
और फिर गृहस्थी
बच्चे
लगे अच्छे
पर बढ़ने लगे खर्चे
काम
बिना आराम
घर चलाना नहीं आसान
जीवन
भटकते रहे हम
कभी खशी कभी गम
बुढापा
स्यापा
हानि हुई या मुनाफ़ा

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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