तुम रिश्तों को को क्या समझोगे ?

जब बासंती ऋतू आती है ,
कलियों की गलियाँ जाते हो
देखा फूल ,आयी जो खुशबू ,
गुंजन करते , मंडराते हो
करके फूलों का अवगुंठन ,
करते हो रसपान मधुर तुम
डाल डाल पर ,पुष्प पुष्प पर ,
इधर उधर भटका करते तुम
तुम रस के लोभी भँवरे हो,
तन भी काला ,मन भी काला
तुम रिश्तों को क्या समझोगे ?
जब चुनाव का मौसम आता ,
तुम गलियाँ गलियाँ जाते हो
देते आश्वासन और भाषण ,
जनता को तुम बहकाते हो
करते लम्बे लम्बे वादे ,
जो न कभी पूरे हो पाते
तुमको केवल वोट चाहिये ,
जन सेवा की चाह बताके
तुम सत्ता के लोभी नेता ,
उजले कपडे पर मन काला
तुम रिश्तों को क्या समझोगे ?
हर मौसम में,हर दिन ,हर पल ,
जोड़ तोड़ कर ,जैसे ,तैसे
तुम पैसे के पीछे पागल ,
तुम्हे कमाने है बस पैसे
परिवार को किया विस्मरित
कर बूढ़े माँ बाप ,तिरस्कृत
इतनी दौलत ,इतना पैसा ,
किसके लिये कर रहे संचित
फिरते भागे ,मगर अभागे
मन भी काला ,धन भी काला

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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