थका हुआ घोड़ा

जीवन के कितने ही दुर्गम ,पथ पर सरपट ,भागा दोड़ा

मै तो थका हुआ हूँ घोड़ा
मै हूँ अश्व रवि के रथ का ,करता हूँ ,दिन रात नियंत्रित
सेवा और परोपकार में, मेरा सारा जीवन अर्पित
कभी ,किसी तांगे में जुत कर ,लोगों को मंजिल दिलवाई
कभी किसी दूल्हे को अपनी ,पीठ बिठा ,शादी करवाई
कितने वीर सैनिको ने थी ,करी सवारी,मुझ पर ,रण में
‘ पोलो’और खेल कितने ही ,खेले मैंने ,क्रीडांगन में
राजा और शूरवीरों का ,रहा हमेशा ,प्रिय साथी बन
उनके रथ को दौडाता था,मै ही था द्रुतगामी वाहन
झाँसीवाली रानी के संग ,अंग्रेजों से युद्ध किया था
अमर सिंह राठौर सरीखे,वीरों के संग ,मरा,जिया था
महाराणा प्रताप से योद्धा ,बैठे थे मेरी काठी में
मेरी टापों के स्वर अब भी ,गूँज रहे हल्दी घाटी में
दिया कृष्ण ने अर्जुन को जब,गीता ज्ञान,महाभारत में
ज्ञान सुधा मैंने भी पी थी ,मै था जुता हुआ उस रथ में
प्रकटा था समुद्र मंथन में ,लक्ष्मीजी का मै भाई हूँ
मै शक्ती का मापदंड हूँ , अश्व -शक्ती की मै इकाई हूँ
हुआ अशक्त मशीनी युग में ,लोगों ने मेरा संग छोड़ा
मै तो थका हुआ हूँ घोडा

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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