आशिकी का वो ज़माना याद है ,
हम रसीले,स्वाद,मीठे आम थे
रोज मियां ,मारते थे ,फ़ाक़्ता ,
बड़े ही दिलफेंक और बदनाम थे
थी जवानी की महक और ताजगी ,
जिन्दगी गुलज़ार थी,गुलफाम थे
बुढापे ने है निकम्मा कर दिया ,
वरना हम भी आदमी थे काम के
‘घोटू ‘

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