जिन्दगी-चार मुक्तक

जिन्दगी थी ,खूबसूरत ,जिन पलों में
रहे उलझे,सांसारिक , सिलसिलों में
फेर में नन्यान्वे के रहे फंस कर ,
फायदे ,नुक्सान की ही अटकलों में

हमें अच्छा या बुरा कुछ दिख न पाया
भटकता ही रहा ये मन, टिक न पाया
अभी तक हिसाब ये हम कर न पाये ,
हमने क्या क्या खोया और क्या क्या कमाया

जिन्दगी का मुल्य हम ना जान पाये
आपाधापी में यूं ही बस दिन बिताये
व्यर्थ की ही उलझनों में रहे उलझे ,
अधूरी रह गयी मन की कामनायें

सांझ आयी ,सूर्य ढलने लग गया है
उम्र का ये दौर ,खलने लग गया है
जितना भी हो सके,जीवन का मज़ा लें,
ख्याल मन में ये मचलने लग गया है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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