चढ़ावा
दुनिया भर को रोशन करता ,बिना कुछ पैसे लिये
ताल,कुवे,नदियां सब भरता ,बिना कुछ पैसे लिये
मस्त हवा के झोंके लाता , बिना कुछ पैसे लिये
धूप,चाँदनी से नहलाता ,बिना कुछ पैसे लिये
खेतों मे है अन्न उगाता ,बिना कुछ पैसे लिये
एक बीज से वृक्ष बनाता , बिना कुछ,,पैसे लिये
मन था उपकृत,एहसानों से,और मैंने इसलिये
गया मंदिर ,उसके दर पर, चढ़ा कुछ रुपए दिये
मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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