बरसात
जब ना आती ,तो तरसाती,आती,रस बरसाती हो
रसवन्ती निज बौछारों से ,जीवन को सरसाती हो
मगर तुम्हारा अधिक प्यार भी,परेशानियाँ लाता है
जब लगती है झड़ी प्यार की ,तो यह मन उकताता है
संयम से जो रहे संतुलित ,वही सुहाता है मन को
पत्नी कहूँ,प्रियतमा बोलूँ ,या बरसात कहूँ तुमको

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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