सवेरे की सैर
सवेरे सवेरे ,
प्राची के एक कोने से,
झाँकता हुआ सूरज ,
देखता है ये सारे नज़ारे
अपने हालातों से परेशान,
फिर भी अट्ठ्हास लगाते हुये ,
लाफिंग क्लब के,सदस्य सारे
सासों के शिकवे ,बहुओं के गिले
सुनाई देते है,कभी न खतम होने वाले,
अंत हीन सिलसिले
लकड़ी के सहारे ,धीरे धीरे टहलते ,
बुजुर्गों की व्यथाएं
बढ़ती हुई उमर की,पीड़ा की कथाएँ
प्राम मे बैठा कर ,अपने नन्हें पोते,पोतियाँ
घुमाती हुई,घुटनो के दर्द से ,
पीड़ित उनकी दादियाँ
अपने नाजुक कंधों पर,
ढेर सारी किताबों का बोझ लादे ,
भविष्य के सपने सँजोये ,
स्कूल बस पकड़ने भागते बच्चेऔर बच्चियाँ
और हाथ मे सेंडविच लिए,
बच्चों को खिलाती हुई ,
उनके संग संग भागती ,उनकी मम्मियाँ
अपने लाडले को झूला झुलाते हुये पिता
और हर पेंग पर ,उसकी मम्मी ,
उसे केले का एक बाइट खिलाती जाये
फोन पर प्रवचन या पुराने गाने सुनते,
सेहत के प्रति जागरूक ,
पुरुष और महिलायें
अपनी बुझती हुई आँखों मे ,
भरे हुये लाचारी
हरी हरी घाँस पर ,
नंगे पैर घूमते नर नारी
मै भी सुबह सुबह की सैर के बाद,
ठंडी ठंडी हवाओं के झोंकों से,
ठंडी सी सांस भर , एक बार
थका थका ,अपने घर की तरफ लौटता हूँ,
जहां पर चाय का प्याला बना,
मेरी बीबी ,कर रही होगी मेरा इंतजार

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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