जीभ और दाँत
जीभ हो या दाँत हो ,सब एक ही परिवार है
बहुत भाईचारा इनमे,अपनापन और प्यार है
जीभ है माँ सी मुलायम,दाँत बेटे सख्त है
चबा कर देते है खाना ,मातृ के वो भक्त है
काटता है जो कोई तो,कोई फिर है चबाता
बड़ा हो छोटा हो पर कंधे से कंधा मिलाता
काम करने का सभी का ,अपना अपना ढंग है
एक घर मे ,ऊपर नीचे,सभी रहते संग है
अगर दाँतो बीच मे जो ,कचरा कुछ भी जा फसे
माँ सी हो बेचैन,बेकल ,ढूंढती जिव्हा उसे
करती रहती कोशिशें,जब तक न वो जाये निकल
अच्छे अच्छों की उतारे ,कैंची सी जो जाये चल
प्यार मे रसभरी है तो गुस्से मे अंगार है
जीभ हो या दाँत हो सब एक ही परिवार है
मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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