प्रियतमे कब आओगी
मेरे दिल को तोड़ कर
यूं ही अकेला छोड़ कर
जब से तुम मैके गई
चैन सब ले के गयी
इस कदर असहाय हूँ
खुद ही बनाता चाय हूँ
खाना क्या,क्या नाश्ता
खाता पीज़ा, पास्ता
या फिर मेगी बनाता
काम अपना चलाता
रात भी अब ना कटे
बदलता हूँ करवटें
अब तो गर्मी भी गयी
बारिशें है आ गयी
कब तलक तड़फाओगी
प्रियतमे कब आओगी ?

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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