Archive for November, 2013

जीवन की चाल


जीवन की चाल
बचपन में घुटनो बल चले ,डगमग सी चाल थी,
उँगली पकड़ बड़ों की,चलना सीखते थे हम
आयी जवानी ,अपने पैरों जब खड़े हुए ,
मस्ती थी छायी और बहकने लगे कदम
चालें ही रहे चलते उल्टी ,सीधी ,ढाई घर ,
उनको हराने ,खुद को जिताने के वास्ते ,
सारी उमर का चाल चलन ,चाल पर चला ,
आया बुढ़ापा ,लाठी ले के चल रहे है हम
घोटू

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हम गुलाब है


       हम गुलाब है

छेड़ोगे तो चुभ जायेंगे ,कांटे है बदन पर ,
                   सूँघोगे ,देंगे  तुमको ख़ुशबू  लाजबाब हम  
दिखते है पंखुड़ी पंखुड़ी अलग ,मगर एक है,
                    हैं एकता और भाईचारे की किताब  हम
मसलोगे तो गुलकन्द ,उबालो तो इत्र बन,
                    आयेंगे काम आपके ,बस बेहिसाब हम
काटोगे डाली ,रोप दोगे ,फिर से उगेंगे ,
                     महका देंगे जीवन तुम्हारा ,हैं गुलाब हम

घोटू

बलात्कार


           बलात्कार

कितने ही स्थानो पर ,कितनी ही बार
डाक बंगलों में,सूनी जगहों में ,
इधर उधर या सरे बाज़ार
हो जाता है बलात्कार
कितनी ही महिलाओं की ,इज्जत लूटी जाती है
उनमे से आधी से ज्यादा ,
सामाजिक कारणो से ,सामने नहीं आती है
कुछ की रिपोर्ट पुलिसवाले नहीं लिखते,
कुछ की रिपोर्ट ,लिखाई नहीं जाती है
रोज होते है ,कितने ही ऐसे बलात्कार
पर नहीं बनते है हेडलाइन के समाचार
ब्रेकिंग न्यूज तब बनती है जब कोई,
वी आई पी ,नेता ,संत या हाई प्रोफाइल वाला
किसी कन्या से करता है मुंह काला
और जब पीड़िता साहस करती है,
करने का  अपनी पीड़ा उजागर
तो बार बार टी वी के चेनलों पर
उस घटना की बखिया उधेड़ी जाती है
बिना सोचे कि इससे पीड़िता ,
कितनी और पीड़ा पाती है
पर उनकी तो टी आर पी बढ़ जाती है
ये बलात्कारी कैसे होते है ,
इन्हे कैसे है पहचाना जाता
जब भी ,किसी के अंदर का पशु ,
जहाँ कहीं भी है जग जाता
हो जाता वो उद्दण्ड ,भूल जाता मर्यादा
और अपनी हवस मिटाने को ,
क्या क्या कर जाता
उन्माद के क्षणों में ,
जब कुछ कर गुजरने की असीम उत्कंठा ,
विवेक का गला दबा देती है ,
मस्तिष्क निष्क्रीय हो जाता है ,
और पशुता पड़  जाती है भारी
आदमी बन जाता है बलात्कारी

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

मन उच्श्रृंखल


          मन उच्श्रृंखल

 

इधर उधर भटका करता है ,हर क्षण,हरपल

मन उच्श्रृंखल 

कभी चाँद पर पंहुच ,सोमरस पिया करता

कभी चांदनी साथ किलोलें ,किया करता

करता है अभिसार कभी संध्या के संग में

हो जाता है  लाल , कभी  उषा  के  रंग में

कभी तारिकाओं के संग है मौज मनाता

कभी बांहों में,निशा की,बंध  कर खो जाता

सो जाता है कभी ओढ़ ,रजनी  का आँचल

मन उच्श्रृंखल

कभी किरण के साथ ,टहलने निकला करता

कभी भोर के साथ ,छेड़खानी  है करता

कभी पवन के साथ,मस्त होकर है  बहता

कभी कली के आस पास मंडराता रहता

कभी पुष्प रसपान किया करता ,बन मधुकर

कलरव करता ,कभी पंछियों के संग ,उड़ कर

नहीं किसी के बस में ये दीवाना ,पागल

मन उच्श्रृंखल  

 

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

मैं सुई हूँ


       मैं  सुई हूँ

तीखी बातें दिल को चुभती ,मिर्च तीखी चरपरी
मगर मै तीखी बहुत हूँ,आत्म गौरव से  भरी
बड़ी दुबली पतली सी हूँ,मगर मुझ में तेज है
एक तरफ से हूँ नुकीली ,एक तरफ से छेद  है
साथ में लेकर के धागा ,मै फटों  को टाँकती
मगर दुनिया ,नहीं मेरी ,सही कीमत आंकती
खाल मानव ओढ़ता था ,लायी हूँ मै सभ्यता
मेरी ही तो बदौलत है ,इन्सां कपड़ों से सजा
कभी इंजेक्शन में लग कर ,डालती तन में दवा
अच्छे अच्छे टायरों की,निकलती मुझसे हवा
दिखने में हूँ क्षीणकाया ,और छुई मुई हूँ
मै सुई हूँ

मदन मोहन बाहेती’घोटू’ 

समझदार औरतें


          समझदार औरतें

              फायदा
सर्दियों के शुरू होने के पहले ,
खरीदती है गर्मियों के कपडे
और गर्मियों केशुरु होने पर,
ऊनी कपडे खरीद कर लाती है
सुनने में तो अजीब लगता है,
लेकिन कुछ समझदार औरतें,
‘ऑफ सीजन डिस्काउंट सेल’का ;
फायदा इस तरह उठाती है

           देर से आने की दुआ

बच्चे देर से आते हैं ,तो घबराती है
पति देर से आये तो खफा हो जाती है
मगर ‘डोमिनो ‘में पिज़्ज़ा का ऑर्डर देकर ,
उसके देर से आने की दुआ मनाती है

घोटू

तीन सामयिक क्षणिकाए


तीन सामयिक क्षणिकाए
            साहस
फंसे कानूनी फंदे में ,बड़े नामी थे एडीटर
बहुत जो संत पूजित थे ,आज है जेल के अंदर
कृष्ण खुद को बताते थे ,भटकते साँई है दर दर
एक लड़की के साहस ने ,दिया है देखो क्या क्या कर

           पुलिस वाले
हम पुलिस वाले है
हमारी मजबूरियों के भी अंदाज निराले है
आज की  राजनैतिक व्यवस्था को कोसते है
क्योंकि कल तक डंडे से ठोकते थे,
आज उन्हें सलाम ठोकते है

          नया कुत्ता
मेरी गली के ,दूसरी मंजिल के फ्लेट में,
किसी ने एक कुत्ता पाला
गली के कुत्तो ने ,उसकी आवाज सुनी ,
हंगामा कर डाला
उनकी गली में नया कुत्ता आ जाये ,
वो हजम ना कर पाये
इसलिए ,उसके फ्लेट के नीचे ,
भोंकते रहे,चिल्लाये
पर जब   कुछ बस न चला तो चुपचाप,
रिरियाते ,अपने आप
फ्लेट की नीची सीढ़ी के आसपास ,
कर के चले गए पेशाब

घोटू