जीवन की चाल
बचपन में घुटनो बल चले ,डगमग सी चाल थी,
उँगली पकड़ बड़ों की,चलना सीखते थे हम
आयी जवानी ,अपने पैरों जब खड़े हुए ,
मस्ती थी छायी और बहकने लगे कदम
चालें ही रहे चलते उल्टी ,सीधी ,ढाई घर ,
उनको हराने ,खुद को जिताने के वास्ते ,
सारी उमर का चाल चलन ,चाल पर चला ,
आया बुढ़ापा ,लाठी ले के चल रहे है हम
घोटू

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