जैसे उसके दिन फिरे ….

     पहले अस्त व्यस्त था रहता
     खुश,बिंदास मस्त था  रहता
     किन्तु हुई है जबसे शादी,
      बिलकुल अनुशासन में रहता
          जैसे उसके दिन फिरे ,सबके ही फिर जाय  
     जब से डाली है वरमाला
     बना किसी का है घरवाला
     पत्नीजी ने ठोक ठाक कर,
     पूरा उसे बदल ही डाला
            जैसे उसके दिन फिरे ,सबके ही फिर जाय
    बड़े चाव से दूल्हा बनकर
    काटे सात ,अग्नी के चक्कर
    पत्नीजी के आस पास ही  ,
    वो काटा करता है चक्कर
               जैसे उसके दिन फिरे ,सबके ही फिर जाय
    पति पत्नी में मेल हुआ जब
    और शादी का खेल हुआ जब
     ऐसा बंधा गृहस्थी बंधन ,
     वो कोल्हू का बेल हुआ अब
                 जैसे उसके दिन फिरे,सबके ही फिर जाय
    पहले मस्ती थी,अल्हड़पन
    ना श्रद्धा ना भजन कीर्तन
    भक्तिभाव जागा शादी कर,
     करता है नित पत्नी पूजन
                  जैसे उसके दिन फिरे ,सबके ही फिर जाय   
          
    मदन मोहन बाहेती’घोटू’ 

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