आम आदमी -ख़ास आदमी

इस बार ,देश की राजनीति में ,
एक क्रांतिकारी इत्तेफाक  हो गया
एक आम आदमी ,अचानक ख़ास हो गया
उसकी सादगी और इरादों ने ,
त्रस्त और दुखी जनता  के मन में आस जगा दी
कि चुनाव में,ख़ास आदमी को ,जनता ने धूल चटा दी
पर बदकिस्मती से ,वो इतना भी ख़ास न हुआ ,
कि अपने खुद के बूते,सत्ता की कुर्सी पर चढ़े
तो वो ख़ास आदमी,जो थोड़े ही ख़ास रह गए थे ,
उसकी तरफ सहयोग देने को बढे
यही सोच कर कि आम आदमी अनुभवहीन है,
वादे पूरे  नहीं कर पायेगा
और शीध्र ही ‘एक्सपोज ‘हो जाएगा
आम आदमी इनके इरादों को अच्छी तरह समझता था
इसलिये फूंक फूंक कर कदम रखता था
वो अच्छी तरह जानता था ये बात
इनका कोई भरोसा नहीं,कब खींच ले हाथ
पर इस चक्कर में ,अच्छा खासा बवाल होगया
अब क्या होगा ,सब के मन में ये सवाल हो गया
लोग कहने लगे ,आम आदमी ये क्या कर रहा है
जिम्मेदारी से डर रहा है  ,वादों से मुकर रहा है
आम आदमी को राजनीति करना नहीं आता है
इसलिए सत्ता में आने से घबराता है
पर एक दिन ,जनता की राय लेकर ,
आम आदमी बैठ गया कुर्सी पर
और वो जैसे अपना घर चलाता था ,
उसी किफायत और अनुशासन से ,
सरकार चलाने लगा    
उसका ये तरीका ,लोगों को पसंद आने लगा
और उसकी सरकार जब ठीक से चलने लगी
पुराने ख़ास लोगों को ये बात खलने लगी
सोचा कि लोगों को अगर,
 सुशासन की आदत पड़ जायेगी
तो हमारी तो लुटिया ही डूब जायेगी
और एक दिन बौखला कर ख़ास आदमियों ने ,
सरकार से अपना सहयोग हटा लिया
और आम आदमी को सत्ता से गिरा दिया
और इससे जनता के आगे ,
ख़ास आदमियों की पोल खुल गयी
और अगले आम  चुनाव में ,सरकार ही बदल गयी

मदन मोहन बाहेती  ‘घोटू’

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