Archive for January, 2014

शब्दहीन संवाद -आंसू और मुस्कान


          शब्दहीन संवाद -आंसू और मुस्कान
                           आंसू
मन की पीड़ा ,दिल का दर्द उमड़ आता है ,
बिना कहे  ही ,कितना कुछ कह देते आंसू
ये पानी की बूँद छलकती जब   आँखों में ,
पलक द्वार को तोड़ ,यूं ही बह लेते  आंसू
बिन बोले ही मन के भाव उभर आते है ,
जब ये आंसू ,आँखों में भर भर आते है
चुभन ह्रदय में होती,नीर नयन से बहता ,
मन मसोस कर ,कितना कुछ सह लेते आंसू
                    मुस्कान
जब मन का आनंद समा ना पाता मन में ,
तो सुख बन मुस्कान,,नज़र आते चेहरे पर
बिन बोले ही ,सब कुछ बतला देते सबको ,
मन के सारे भाव ,उभर आते चेहरे पर
युगल ओष्ठ ,चोड़े  हो जाते,बांछे खिलती ,
नयी चमक आती चेहरे पर ,खुशियां दिखती ,
होता है जब मन प्रसन्न तो पुलकित होकर,
खुशियों के सब भाव ,बिखर  जाते चेहरे पर

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

तू भी देख बदल कर चोला


        तू भी देख बदल कर चोला

                                  कल मुझसे मेरा मन बोला
                                   तू भी देख बदल कर चोला
मैंने सोचा क्या बन देखूं,जिससे सबसे प्यार कर सकूं
जनता की सेवा कर पाऊँ ,लोगों पर  उपकार कर सकूं
आयी एक आवाज ह्रदय से ,तेरी  वाणी में  है  जादू
इधर उधर की सोच रहा क्या ,नेता क्यों ना बन जाता तू
खादी  का कुरता पाजामा ,रंग बिरंगी टोपी सर पर
झूंठे वादे और आश्वासन ,देने होंगे तुझको दिन भर
कभी किसी की चाटुकारिता ,कभी किसी को देना गाली
ले सेवा का नाम लूटना , नेतागिरी की प्रथा निराली
दंद फंद  करने पड़ते है ,पर तू तो है बिलकुल भोला
                                 कल मुझसे मेरा दिल बोला
सोचा फिर क्या करूं ,भला है,इससे मैं साधू बन जाऊं
करूं भागवत ,कथा ,प्रवचन ,कीर्तन करूं ,प्रभु गुण गाउँ
वस्त्र गेरुआ धारण करके ,कुछ दाढ़ी बढ़वानी  होगी
अपने भाषण और प्रवचन में,नाटकीयता लानी होगी
सत्संगों में भीड़ जुटेगी,पागल सी जनता उमड़ेगी
सत्ता के गलियारों में भी,पहुँच और पहचान बढ़ेगी   
जनता भोली है ,करवालो,कुछ भी इससे,धर्म नाम पर
अपना तन मन और धन सब कुछ,कर देगी तुम पर न्योछावर
तुझे सफलता मिलना निश्चित ,क्योंकि तू है हरफनमौला
                                           कल मुझसे ,मेरा मन बोला

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

क्या भरोसा ?


            क्या भरोसा ?

क्या भरोसा मेह और मेहमान का ,
                       आयेंगे कब और कब ये जायेंगे
बेटा बेटी ,साथ देंगे कब तलक ,
                       सीख लेंगे उड़ना ,सब उड़ जायेंगे
ये तो तय है ,मौत एक दिन आयेगी ,
                         और सरगम ,सांस की थम जायेगी ,
आज फल,इठला रहे जो डाल पर,
                          क्या पता किस रोज ,कब,गिर जायेंगे
कौन अपना और पराया कौन है ,
                                 बाद मृत्यु के विषय ये गौण है      
अहम का है बहम, हम कुछ भी नहीं,
                                 मौत देखेंगे,सहम हम जायेंगे
मृत्यु ही जीवन का शाश्वत सत्य है
                                 बच सकेगा,किस में ये  सामर्थ्य है
जब तलक है तैल ,तब तक रोशनी,
                                 वर्ना  एक दिन ये दिये  बुझ जायेंगे

मदन मोहन बाहेती’घोटू’ 

दिल्ली का कोहरा


        दिल्ली का कोहरा

जब सूरज की रोशनी ,
ऊपर ही ऊपर बंट जाती है,
और जमीन के लोगों तक नहीं पहुँच पाती है
 तो गरीबों की सर्द आहें ,एकत्रित होकर ,
फैलती है वायुमंडल में ,कोहरा बन कर
मंहगाई से त्रसित ,
टूटे हुए आदमी के आंसू ,
जब टूट टूट कर जाते है बिखर
नन्हे नन्हे जल कण बन कर  
तो वातावरण में प्रदूषण होता है दोहरा
और घना हो जाता है कोहरा
और जब आदमी को नहीं सूझती है राह
तो होता है टकराव
 हमें रखनी होगी ये बात याद
कि कोहरा ,अच्छी खासी हरी फसलों को भी,
कर देता है बर्बाद
तो आओ ,ऐसा कुछ करें,
कि गरीबों की आह न फैले निकल के
नहीं बिखरे आंसू,किसी दुखी और विकल के
मिल कर बचाएं हम वातावरण को
ताकि सूरज की रोशनी मिले,हर जन को
 
मदन मोहन बाहेती’घोटू’
 

झुनझुना


          झुनझुना

बचपने में रोते थे तो ,बहलाने के वास्ते ,
                          पकड़ा देती थी हमारे हाथ में माँ, झुनझुना
ये हमारे लिए कुतुहल ,एक होता था बड़ा ,
                          हम हिलाते हाथ थे  और बजने लगता झुनझुना
हो बड़े ,स्कूल ,कालेज में जो पढ़ने को गए ,
                          तो पिताजी ने थमाया ,किताबों का झुनझुना
बोले अच्छे नंबरों से पास जो हो जायेंगे ,
                            जिंदगी भर बजायेंगे ,केरियर  का झुनझुना
फिर हुई शादी हमारी ,और जब बीबी मिली ,
                            पायलों की छनक ,चूड़ी का खनकता झुनझुना
ऐसा कैसा झुनझुना देती है पकड़ा बीबियाँ,
                            गिले शिकवे भूल शौहर ,बजते  बन के झुनझुना
 जिंदगी भर लीडरों ने ,बहुत बहकाया हमें ,
                             दिया पकड़ा हाथ में ,आश्वासनों का झुनझुना
और होती बुढ़ापे में ,तन की हालत इस तरह ,
                              होती हमको झुनझुनी है,बदन जाता झुनझुना

मदन मोहन बाहेती’घोटू’     

हश्र-शादी का


            हश्र-शादी का

अपनी हथेलियों पर ,हमने उन्हें बिठाया ,
                         वो अपनी उँगलियों पर ,हमको नचा रही है
हमने तो मांग उनकी ,सिन्दूर से भरी थी,
                         मांगों को उनकी भरने में ,उम्र   जा रही है
जबसे बने है दूल्हे,सब हेकड़ी हम भूले,
                          बनने के बाद वर हम,बरबाद  हो गए है
जब से पड़ा गले में ,है हार उनके हाथों,
                            हारे ही हारे हैं हम,  नाशाद  हो गए है
शौहर बने है जबसे ,भूले है अपने जौहर ,
                             वो मानती नहीं है,हम थक गए मनाते  
 पतियों की दुर्गती है,विपति ही विपत्ति है,
                             रूह उसकी कांपती है, बीबी की डॉट खाते
हम भूल गए मस्ती,गुम हो गयी है हस्ती,
                             चक्कर में गृहस्थी के, बस इस कदर फसें है
घरवाले उनके बन कर,हालत हुई है बदतर ,
                              घर के भी ना रहे हम,और ना ही घाट  के है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’  

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