अरज -पिया से

प्रियतम! तुम मुझे,
‘प्रिया’ कहो या ‘प्रनवल्ल्भे ‘
‘जीवनसंगिनी ‘या ‘अर्धांगिनी’
‘पत्नी’ या ‘वामांगनी’
‘भार्या’ कहो या’ भामा’
या बच्चों की माँ कह कर बुलाना
कह सकते हो ‘बीबी’ ,’वाईफ’ या ‘जोरू’
पर मैं आपके हाथ जोडूं
मुझे ‘घरवाली’कह कर मत बुलाना  
वरना मैं कर दूंगी हंगामा
क्योंकि घरवाली कहने से ये होता है आभास
कोई बाहरवाली भी है आपके पास
और सौतन का बहम
भी मैं नहीं कर सकती सहन
और घरवाली शब्द में ,
घरवाली मुर्गी का होता है अहसास
जो लोग कहते है होती है दाल के बराबर
और मैं प्राणेश्वर !
दाल के बराबर नहीं ,
दिल के बराबर स्थान पाना चाहती हूँ
इसलिए ,आप कुछ भी पुकार ले,
घरवाली नहीं कहलाना चाहती हूँ

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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