दिल्ली का कोहरा

जब सूरज की रोशनी ,
ऊपर ही ऊपर बंट जाती है,
और जमीन के लोगों तक नहीं पहुँच पाती है
 तो गरीबों की सर्द आहें ,एकत्रित होकर ,
फैलती है वायुमंडल में ,कोहरा बन कर
मंहगाई से त्रसित ,
टूटे हुए आदमी के आंसू ,
जब टूट टूट कर जाते है बिखर
नन्हे नन्हे जल कण बन कर  
तो वातावरण में प्रदूषण होता है दोहरा
और घना हो जाता है कोहरा
और जब आदमी को नहीं सूझती है राह
तो होता है टकराव
 हमें रखनी होगी ये बात याद
कि कोहरा ,अच्छी खासी हरी फसलों को भी,
कर देता है बर्बाद
तो आओ ,ऐसा कुछ करें,
कि गरीबों की आह न फैले निकल के
नहीं बिखरे आंसू,किसी दुखी और विकल के
मिल कर बचाएं हम वातावरण को
ताकि सूरज की रोशनी मिले,हर जन को
 
मदन मोहन बाहेती’घोटू’
 

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